Case presentation: यकृद्दाल्युदर {Non Alcoholic Fatty Liver Disease (NAFLD)} by Vaidyaraja Subhash Sharma
*Case-presentation*
- यकृद्दाल्युदर-
Non-Alcoholic Fatty Liver Disease (NAFLD) progressing to Compensated Cirrhosis*
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*Vaidyaraja Subhash Sharma, MD (kaya chikitsa, jamnagar - 1985)*
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*Chapter -1*
*माधव निदान का काल 1200 से 1400 वर्ष पूर्व तक माना गया जिसमें उदर रोगों में यकृद्दाल्युदर का उल्लेख लक्षणों सहित है। तब तो liver fibroscan की सुविधा नहीं थी।किस प्रकार से आचार्य इस प्रकार की गंभीर व्याधियों की परीक्षा कर सटीक निदान एवं चिकित्सा करते थे ! आज स्पष्ट करेंगे चिकित्सोपयोगी शास्त्रों में इस रोग पर वर्णित सूत्रों की clinical applications...*
*1- ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों को समर्थ एवं सक्षम बनाकर निदान में उपयोग।*
*2- यकृद्दाल्युदर की त्रिविध परीक्षा*
*3- a- दशविध परीक्षा*
*b- त्रिविध प्रमाण और युक्ति*
*4- जैसे सभी द्रव्य पंचभौतिक हैं तो रोग भी पंचभौतिक है, इसकी पंचभौतिकता।*
*5- रोगी के ना बताने पर भी चिन्हों द्वारा इसका या अन्य रोगों का भी निर्णय करना।*
*6- यकृद्दाल्युदर के दोष-दूष्य-स्रोतस-स्रोतोदुष्टि-अग्नि-साध्यासाध्यता-उपद्रव-चिकित्सा सूत्र-पथ्यापथ्य एवं औषध व्यवस्था।*
*आयुर्वेद के संहिता ग्रन्थों में यकृत के रोगों का विवरण अति विस्तार से नहीं मिलता,
'सव्यान्यपार्श्वे यकृति प्रवृद्धे ज्ञेयं यकृद्दाल्युदरं तदेव'
मा नि 35/16-17
इस पर मधुकोष व्याख्या,
'प्लीहोदर एव यकृद्दाल्युदरस्यावरोधं दर्शयन्नाह– सव्यान्यपार्श्व इत्यादि सव्यान्यपार्श्वे दक्षिणपार्श्वे तदेवेति तादृशमेव'
जो विकार प्लीहा के बताये हैं वही विकार दक्षिण पार्श्व में यकृत वृद्धि से होने वाले यकृद्दाल्युदर कह कर बताये हैं। यकृद्दाल्युदर की निरूक्ति जिसमें यकृत को दालयति अर्थात दोषों के द्वारा अत्यन्त विकृत कर देता है जैसे यकृत के दलों या खण्डों में शोथ, शोष, दाह, पीड़ा आदि उपद्रवों को कर देता है।*
*यकृद्दाल्युदर में दोषों का संबंध कैसे मानेंगे ! क्योंकि यह तो मूलतः पित्त का स्थान है ! यह पक्ष अति महत्वपूर्ण पक्ष है जो भली प्रकार जान सकते हैं,
'तत्र दोषसम्बन्धमाह–
प्लीहोदरयकृद्दाल्युदरयोः पृथग्लक्षणलक्षितान् मलान् वातादीन् क्रमेणोदावर्तादिभिर्लिङ्गैर्विद्यात्, तत्र उदावर्तरुजानाहैर्वातं, मोहतृड्दहन -ज्वरैः पित्तं, गौरवारुचिकाठिन्यैः कफं जानीयात्'
मा नि 35/18
यकृद्दाल्युदर में तीनों दोषों का अनुबंध होता है।*
*Fatty liver, liver fibrosis और cirrhosis of liver ये सब त्रिदोषज व्याधि है। व्याधि के दो प्रकार है आमाशयोत्थ और पक्वाश्योत्थ।
*यहां liver fibrosis की या cirrhosis of liver के मूल में जाये तो इनमें दोषों का संचय कहां होगा ? दोषों का संचय अपने अपने स्थानों पर कोष्ठ में इस प्रकार होगा जैसे आमाशय में कफ का, ग्रहणी में पित्त का और पक्वाशय में वात का। यही आयुर्वेद का एक गूढ़ clinical ज्ञान है जिसकी उपेक्षा कर दी जाती है इसीलिये चिकित्सा सूत्र का निर्माण किया जाता है कि जिन जिन दोषों का अनुबंध है उन्हें भी हम समाप्त कर दें जिस से व्याधि का पुनःउद्भव ना हो पाये।*
*1 - रूग्णा का विवरण*
*आयु -42 वर्ष (महिला)*
*वजन-92kg (Obese/Overweight)*
*व्यसन - Non alcoholic*
*वर्तमान स्थिति - Non-Diabetic परंतु उच्च स्तर पर risk*
*No Clinical Symptoms (Asymptomatic)*
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[2/10, 1:15 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*Chapter - 2*
*रोगी व्याधि के फल अर्थात Symptoms को भोगता है और वही बताता है जबकि भिषग् अपने अनुभवजन्य शास्त्रज्ञान और अपनी युक्ति से व्याधि के मूल या Root cause और उसके भविष्य कथन अर्थात Prognosis को बिना बोले ही जान लेता है। यही 'प्रत्यक्ष' और 'अनुमान' प्रमाण की सार्थकता है।*
*शान्त एवं प्रसन्न मन की एकाग्रता, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध और प्रश्न अपने आप से और रोगी से करना, अपनी इन्द्रियों को समर्थ बनाने की यह प्रथम सीढ़ी है ।*
*एक कुशल वैद्य के लिए रोगी का कथन Subjective केवल एक संकेत है जबकि चिकित्सक द्वारा स्वयं देखा गया सत्य Objective ही वास्तविक निदान का आधार है।*
*रूग्णा की इच्छा केवल आयुर्वेदानुरूप बिना किसी side effect और दुर्बलता को प्राप्त हो मात्र शरीर का भार कम करने की थी।*
*रोगी प्रायः अपने भीतर पल रही गंभीर व्याधि को केवल 'मोटापा' या 'थकान' समझकर अनदेखा कर देता है। यदि प्राचीन काल में fibroscan की तकनीक उपलब्ध न थी तो आयुर्वेद के 'दर्शन' और 'स्पर्शन' प्रमाण के आधार पर शरीर में छिपे ये 'मूक' संकेत अर्थात Silent Signs सिरोसिस और यकृत की दुष्टि की स्पष्ट घोषणा करते थे।*
*इन्हें हम यकृद्दाल्युदर के क्लिनिकल संकेतों के रूप में इस प्रकार देख सकते हैं जो रूग्णा में मिल रहे थे।*
*दर्शन परीक्षा-*
*त्वचा का वर्ण और प्रभा,यकृत की विकृति होने पर त्वचा अपनी स्वाभाविक प्रभा Luster खो देती है और उस पर एक विशिष्ट पाण्डुता या श्याम वर्ण छाने लगता है। यह रंजक पित्त के दूषित होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।प्रश्न करने पर उत्तर मिला कि पिछले कुछ दिनों से चेहरा देख कर सब टोक रहे हैं कि बीमार से लग रहे हो।*
*मकड़ी के जाले जैसी शिरायें, रूग्णा के गर्दन पर लाल रंग की सूक्ष्म रक्तवाहिकाएं मकड़ी के जाले की तरह उभरने लगी थी जो ध्यान से देखने पर प्रतीत हो रही थी। इसे रक्तवह स्रोतस की विकृति और विमार्गगमन का संकेत माना जा सकता है।*
*हथेलियों की लालिमा, रूग्णा की नाड़ी देखते हुये हथेलियों के उभरे हुए हिस्से अंगूठे और छोटी ऊंगली के पास असामान्य रूप से ताम्र वर्ण के दिख रहे थे तो यह यकृत के भीतर बढ़े हुए पित्त और चयापचय की गड़बड़ी को दर्शाते थे।*
*नाभि के चारों ओर अति सूक्ष्म नीली सी सिरायें उभर कर दिखने लगती थी जो कभी भी नहीं भी दिखती थी।यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यकृत के भीतर स्रोतोरोध इतना बढ़ गया है कि रक्त को वैकल्पिक मार्गों से बहना पड़ रहा है।*
*नेत्रों के श्वेत भाग में हल्की मलिन पीत रंगत थी जिसे रूग्णा प्रायः नींद की कमी समझता थी जो वास्तव में यकृत द्वारा पित्त के विसर्जन में विफलता का संकेत है।*
*स्पर्शन और सूक्ष्म संकेत -*
*दाहिनी पार्श्व की ओर दबाने पर यदि मांस पेशियों जैसी कोमलता के स्थान पर किंचित गुरूता मिल रही थी।*
*बिना हेतु मिले भी मेदोवृद्धि और शोथ में एक अंतर यह मिलता है Ankles को दबाने दबाने पर गड्ढा पड़े जिसे pitting edema कहते हैं तो यह संकेत देता है कि यह केवल 'मेद' नहीं बल्कि 'क्लेद' और 'उदक' का संचय है।*
*नाड़ी परीक्षा में मध्यमा अंगुली के नीचे 'काठिन्य' और 'तनाव' अनुभव हो रहा था तो यह अनेक रोगियों पोर्टल हाइपरटेंशन और यकृत के भीतर बढ़े हुए दबाव का अनुमान कराता है जो प्रायः लिवर सिरोसिस रोगियों में मिलता रहा है।*
*कभी कभी भोजन के घंटों बाद भी उदर का गुब्बारे की तरह फूलना bloating और स्पर्श करने पर पुट पुट से शब्द या tympany होना यह बताता है कि समान वायु और पाचक पित्त पूरी तरह कुपित हो चुके हैं जिसे रूग्णा सामान्यतः गैस मान रही थी।*
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[2/10, 1:15 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*Chapter - 3*
*यहां हमने यकृद्दाल्युदर के संदर्भ में चार प्रकार के प्रमाणों का clinical application का उपयोग इस प्रकार किया....*
*प्रत्यक्ष प्रमाण -*
*रोगी केवल वजन कम करने की इच्छा लेकर आई है परंतु एक चिकित्सक का प्रत्यक्ष प्रमाण निम्नलिखित सत्य देखता है...*
*भिषग् रोगी के चेहरे पर कांति-हानि और आंखों के cornea के आसपास एक विशिष्ट आभा देखता है जो आलोचक पित्त की विकृति बताती है। यकृत के स्थान पर किंचित दबाने पर उदर का हल्का सा उभरा होना या Distension भले ही रोगी उसे मोटापा समझे हम उसे यकृत की वृद्धि समझते है।*
*जब हम Right Hypochondrium को स्पर्श करते है तो किंचित काठिन्य का अनुभव होता है। 92 kg वजन में मेद मृदु होता है, लेकिन सिरोसिस में वहाँ एक 'पाषाणवत' पत्थर जैसी कठोरता महसूस होती है जो 'प्रत्यक्ष' प्रमाण है कि व्याधि साधारण नहीं गंभीर भी संभव है।*
*अनुमान प्रमाण -*
*रूग्णा कह रही है कि वह केवल मोटी है, लेकिन यहां एक भिषग् अपनी युक्ति से 'अनुमान' लगाता है।*
*धातु क्षय का अनुमान -
यहां रूग्णा के उदर पर Fat है लेकिन उसके गाल धंसे हुए हैं और मांसपेशियों में शैथिल्य या Flabbiness है तो यहां अनुमान लगाया जाता है कि 'मेद' तो बढ़ रहा है लेकिन 'मांस' और 'अस्थि' धातु का पोषण नहीं हो रहा।*
*अग्नि-साद का अनुमान -
रूग्णा वजन कम करने के लिए कम खाने का दावा तो कर रही है लेकिन हम उसकी जिह्वा की लिप्तता अर्थात coating देखकर अनुमान लगाते है कि इसकी धात्वाग्नि इतनी मंद है कि वह जो भी खाती है, वह 'आम' बनकर यकृत में संचित हो रहा है।*
*आप्तोपदेश प्रमाण -*
*रूग्णा को लगता है कि उसे कोई रोग नहीं है लेकिन हमारे मस्तिष्क में आप्तोपदेश,
'अग्निदोषान्मनुष्याणां रोगसङ्घाः पृथग्विधाः मलवृद्ध्या प्रवर्तन्ते विशेषेणोदराणि तु मन्देऽग्नौ मलिनैर्भुक्तैरपाकाद्दोषसञ्चयः प्राणाग्न्यपानान् सन्दूष्य मार्गान्रुद्ध्वाऽधरोत्तरान् त्वङ्मांसान्तरमागम्य कुक्षिमाध्मापयन् भृशम् जनयत्युदरं तस्य हेतुं शृणु सलक्षणम्.....प्लीहार्शोग्रहणीदोषकर्शनात् कर्मविभ्रमात् क्लिष्टानामप्रतीकाराद्रौक्ष्याद्वेगविधारणात् स्रोतसां दूषणादामात् सङ्क्षोभादतिपूरणात्'
च चि उदर रोग 13/ 9-14,
यह सूत्र स्मरण आ जाते हैं जो उदर रोगों की विभिन्न अवस्थाओं का विस्तार करने में अति सहायक बनते हैं।यकृत और प्लीहा को प्रायः साथ ही मान लिया जाता है और निष्कर्ष यह मिलता है कि यदि यकृत कठिन हो गया है, तो यह 'जलोदर' की पूर्व-अवस्था है और विभिन्न सूत्र सचेत करते हैं कि 42 वर्ष की आयु और यदि अभी चिकित्सा शुरू नहीं की गई, तो यह व्याधि 'कष्टसाध्य' से 'असाध्य' की ओर बढ़ जाएगी।*
*युक्ति प्रमाण-*
*यही वह प्रमाण है जो एक भिषग् को संपूर्ण योजना बनाने में सहायता करता है।*
*यह युक्ति चिकित्सा में काम आयेगी कि ऐसे औषध द्रव्यों का चयन करना है जो वजन भी कम करे और यकृत के काठिन्य को भी मृदु करे।*
*रोगी का जो वजन दिख रहा है, उसमें क्लेद या fluids का अंश कितना है।यहां युक्ति से स्रोतोविशोधन करता है ताकि शरीर का अतिरिक्त मेद और क्लेद मल-मूत्र के मार्ग से बाहर निकल सके।*
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*Chapter -4*
*रूग्णा को कुछ investigations और सीधा ही liver fibro scan के लिये कहा गया जिस से सटीक निदान हो सके जिसमें यह मिला..*
*SGOT/PT - 93/109,
GGT 59,
ALP 161,
HbA1C -7.5,
BSF 131,
TGL 159,
LDL 126*
*LIVER FIBROSCAN -
CAP 296,
kPa 12.6 मिला।*
[2/10, 1:15 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*दशविध आतुर परीक्षा और यकृद्दाल्युदर क्लिनिकल पक्ष...(अनेक पक्षों के क्रम को हमने clinician होने के कारण अपनी सुविधानुसार लिया है) -*
*दूष्य -
यहां मुख्य दूष्य रक्त और मेद हैं। CAP 296 मेद की अतिवृद्धि Severe Steatosis को दर्शाता है जबकि LSM 12.6 रक्तवह स्रोतस के मूल यकृत में रचनात्मक विकृति Fibrosis को इंगित करता है।*
*देश-
रोगी के शरीर आतुर देश में यकृत प्रदेश में काठिन्य है। दिल्ली जैसे उत्तर भारतीय परिवेश साधारण देश होने के कारण कफ-वर्धक आहार की प्रधानता सम्प्राप्ति को बल दे रही है।*
*बल-
रोगी का शारीरिक बल 92 kg भार के कारण ऊपर से अधिक दिख रहा है परंतु आभ्यंतर धातु बल क्षीण है। LSM 12.6 की अवस्था में शरीर की व्याधि-क्षमता Immunity कम होने लगती है।*
*काल-
42 वर्ष की आयु मध्यम वय है जहाँ पित्त प्राकृतिक रूप से प्रबल होता है। वर्तमान काल में यकृत की रक्षा न की गई तो वार्धक्य की ओर बढ़ते हुए यह व्याधि असाध्य हो सकती है।*
*यहाँ जाठराग्नि और धात्वाग्नि साद की स्थिति है। विशेषकर मेदाग्नि के मंद होने से ही CAP 296 वसा संचय की स्थिति उत्पन्न हुई है।*
*प्रकृति-
रूग्णा की प्रकृति कफप्रधान पित्तानुबंधी प्रतीत होती है। कफ के कारण मेद वृद्धि और पित्त के विकृत होने से रंजक पित्त की दुष्टि यकृत विकार हुई है।*
*वय-
42 वर्ष की आयु परिणाम की अवस्था है जहां जीवनशैली के पिछले 20 वर्षों के संचित दोष अब व्याधि के रूप में प्रकट हो रहे हैं।*
*सत्व-
रूग्णा केवल वजन घटाने पर केंद्रित है जो दर्शाता है कि वह रोग की गंभीरता के प्रति अल्प-सत्त्व या अनभिज्ञ है। हमारे जैसे भषग् को उसके मनोबल को स्थिर कर चिकित्सा में सहयोग लेना होगा।*
*सात्म्य-
उत्तर भारतीय भोजन गेहूं, दुग्ध आदि रोगी के लिए सात्म्य है, परंतु इस व्याधि में ये अनुपशय या हानिकारक बन चुके हैं जिन्हें युक्तिपूर्वक बदलना होगा।*
*आहार शक्ति-
रोगी की खाने की क्षमता अधिक हो सकती है, परंतु जरण शक्ति पाचन क्षमता अत्यंत दुर्बल है जिससे आम की उत्पत्ति निरंतर हो रही है।*
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[2/10, 1:15 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*Chapter - 5*
*सम्प्राप्ति घटक -*
*पंचभौतिकता -*
*पृथ्वी + जल की वृद्धि - वसा Fat और कफ के संचय से पृथ्वी और जल महाभूत बढ़ जाते हैं जिससे यकृत में काठिन्यता अर्थात Stiffness आती है।*
*अग्नि का मंद होना -
धातु स्तर पर अग्नि के मंद होने से पार्थिव अंश का पाचन नहीं हो पाता।*
*दोष -*
*पित्त-
प्रधान रूप से रंजक पित्त की विकृति यकृत स्थान और साथ ही पाचक पित्त की मंदता।*
*कफ-
क्लेदक कफ आमाशय में क्लेद वृद्धि और अवलंबक कफ की शिथिलता।*
*वात-
व्यान वायु रक्त संवहन में अवरोध जैसे Portal Hypertension की और भविष्य में अग्रसर हो जाना और समान वायु अग्नि वैषम्य, और अपान वायु का अनुलोमन न होना।*
*दूष्य -*
*धातु-
प्रधान रूप में रक्त और मेद। यहाँ मेदोगत रक्त की भी एक दृष्टि बनती है। उत्तरोत्तर धातु पोषण क्रम बाधित होने से अस्थि, मज्जा, शुक्र का क्षय और जिस प्रकार HbA1C की स्थिति है तो ओज का क्षय भी।*
*मल-
पुरीष का विट्संग और स्वेद अति क्लेद संचय से।*
*स्रोतस और स्रोतोदुष्टि -*
*रक्तवह यकृत-प्लीहा मूल, अन्नवह और मेदोवह स्रोतस।*
*दुष्टि- संग और विमार्गगमन*
*अग्नि -*
*धात्वाग्नि मंदता विशेषकर रक्ताग्नि और मेदाग्नि का साद। इसी कारण वसा CAP 296 का संचय बढ़ रहा है।*
*उपशय और अनुपशय -*
*उपशय-
तिक्त-कटु रस जैसे कुटकी, भूनिम्ब, रूक्षण चिकित्सा, मृदु विरेचन, और लंघन।*
*अनुपशय-
मधुर-अम्ल रस, गुरु आहार दुग्ध उत्पाद,दिवास्वप्न और अति लवण सेवन।*
*साध्यासाध्यता -*
*कष्टसाध्य/याप्य- 12.5 kPa Cirrhosis की अवस्था और 42 की उम्र में यह व्याधि कष्टसाध्य की श्रेणी में आती है। यदि जलोदर Ascites शुरू नहीं हुआ है तो यह याप्य है। पूर्णतः साध्य कहना आधुनिक पैरामीटर्स F4 stage के अनुसार चुनौतीपूर्ण है पर हम आयुर्वेदानुसार रोग को सामान्य कर के पुनःउत्पत्ति की संभावना ना बने इसका प्रयास करेंगे।*
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[2/10, 1:15 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*Chapter - 6*
*चिकित्सा सूत्र -*
*रूग्णा की स्थिति को देखते हुये हमने चिकित्सा सूत्र को diet plan के साथ मिला कर बनाया क्योंकि आहार विधि का मुख्य उद्देश्य लिवर की सूजन कम करना, वजन कम करना और diabetes mellitus से बचाना है।*
*स्रोतोविशोधन*
*शमन*
*नित्य रेचन*
*यकृत-कोशिका पुनर्जीवन
Hepatocyte regeneration के लिये जिसमें वर्धमान पिप्पली रसायन- यह यकृत की रक्ताग्नि को प्रदीप्त करने के लिए श्रेष्ठ है। 3 पिप्पली से शुरू कर 10 तक ले जाकर वापस 3 पर आना गौदुग्ध के अनुपान के साथ, रोगी को दूध इस रूप में दिया तो सात्म्य हो गया।*
*वर्धमान पिप्पली रसायन का प्रयोग इस केस में अत्यंत सावधानीपूर्वक और रूग्णा के कोष्ठ एवं बल के अनुसार किया गया। क्योंकि यहाँ मेदोवृद्धि CAP 296 और यकृत काठिन्य LSM 12.5 दोनों हैं, अतः यह दीपन-पाचन और शोधन का कार्य उत्तम तरीके से करेगा।*
*प्रयोग की विधि - *
*पहले दिन 3 पिप्पली छोटी पिप्पली का यवकुट चूर्ण से शुरु किया*
*आरोहण क्रम में प्रतिदिन 1-1 पिप्पली बढ़ाते गये जैसे दूसरे दिन 4, तीसरे दिन 5 जब तक कि संख्या 10 पिप्पली तक न पहुंची*
*अवरोहण क्रम में 10 पिप्पली की संख्या तक पहुँचने के बाद अगले दिन से 1-1 पिप्पली घटाते गये 9, 8, 7...जब तक कि संख्या वापस 3 पिप्पली पर न आ गई।*
*इसे गाय के दूध या Double toned अथवा मलाई निकला हुआ जैसी सुविधा मिली में मिला कर सेवन कराया गया।*
*पहले के समय में प्राणियों का बल उत्तम था पर अब बल अल्प होने इसके short course कुछ दिन विश्राम दे कर 1 पिप्पली से आरंभ कर 7 दिन के बाद कम कर के भी किये जा सकते हैं।*
*इसे देते हुये विशेष सावधानियां और निर्देशों का पालन किया गया जैसे...*
*पाचन का ध्यान-
यदि रोगी को कभी कभी पिप्पली बढ़ने पर आमाशय दाह या अत्यधिक पित्त की शिकायत मिली तो वृद्धि वहीं रोक दी और संख्या कम करना शुरू कर के प्रातः खाली पेट कूष्माण्ड स्वरस प्रयोग कराया गया और कभी आमलकी-यष्टिमधु भी।*
*धीरे धीरे इस प्रकार यह आराम से सात्म्य हो गया।*
*आहार-
इस कल्प के दौरान केवल दूध और brown rice, सामक चावल, हल्की मूंग की खिचड़ी का ही सेवन बताया गया पर लघु आहार में रूग्णा के कहने पर भोजन में आहार की range बढ़ा दी गई।*
*वर्जित-
अत्यधिक तेल, मिर्च, मसाला और खट्टे पदार्थों के साथ गुड़ और तल से बने पदार्थ, अलसी एवं चिया seeds, काजू, पिस्ता, चाय में अदरक मिला कर या कॉफी का पूरी तरह त्याग कराया गया।*
*इस केस यकृद्दाल्युदर में वर्धमान पिप्पली योग की कार्मुकता -*
*इस योग ने यकृत की रक्ताग्नि को बढ़ाकर फाइब्रोसिस की प्रक्रिया को धीमा किया है।*
*पिप्पली में मौजूद पाइपरिन Piperine कोलेस्ट्रॉल और वसा CAP 296 के चयापचय या Metabolism में सहायक है।*
*यह एक मृदु रेचक के रूप में भी कार्य करता है जिससे पित्त का संचय नहीं होता क्योंकि इसके प्रयोग काल में अतिरिक्त कुटकी चूर्ण की आवश्यकता रेचन हेतु नहीं हुई।*
[2/10, 1:15 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*रोगी महिला है और वजन 92 kg है, तो पिप्पली की उष्णता को सम्यग् बनाये रखने के लिए साथ में अविपत्तिकर चूर्ण और कूष्मांड स्वरस का प्रयोग भी बीच बीच में किया।*
*फलत्रिकादि क्वाथ यकृत उत्तेजक औषध है।*
फलत्रिकादि क्वाथ -
घटक द्रव्य-
हरीतकी, विभीतक, आमलकी, अमृता, वासा, कुटकी, चिरायता और नीम।*
*फलत्रिकादि क्वाथ के गुण कर्म-
लेखन, भेदन, आमलकी तथा हरीतकी से रसायन, वयस्थापक, दीपनीय, रक्त शोधक, मेदमूल और यकृत पर शीघ्र कार्य करने वाला।*
*1- हरीतकी -*
*रस - मधुर,अम्ल,कटु, तिक्त और कषाय एवं प्रधान रस कषाय*
*गुण - लघु-रूक्ष*
*वीर्य - उष्ण*
*विपाक - मधुर*
*प्रभाव - त्रिदोष नाशक*
*मधुर तिक्त कषाय से पित्त नाशक, कटु तिक्त कषाय से कफ नाशक और अम्ल रस से वातनाशक है।दीपन, पाचन, अनुलोमन, कृमिघ्न, यकृद् उत्तेजक, मूत्र विरेचक, मल विरेचक मृदु रूप में, रसायन,मेध्य।*
*पाचन संस्थान - दीपन, पाचन, यकृत उत्तेजक, अनुलोमन, मृदु रेचक।*
*2- विभीतक -*
*रस - कषाय*
*गुण - रूक्ष-लघु*
*वीर्य - उष्ण*
*विपाक - मधुर*
*उष्ण वीर्य से वात शामक, मधुर विपाक और कषाय रस होने से पित्त शामक, गुणों में रूक्ष, लघु और रस में कषाय होने से यह कफ शामक हो कर त्रिदोष नाशक है।*
*दीपन, अनुलोमन, भेदन, रक्त स्तंभक, चक्षुष्य, वेदना स्थापक।*
*पाचन संस्थान- दीपन एवं अनुलोमन*
*3- आमलकी -*
*रस- अम्ल प्रधान पंचरस, लवण रहित*
*गुण - लघु-रूक्ष*
*वीर्य - शीत*
*विपाक - मधुर*
*अम्ल रस से वात शामक,मधुर रस और शीत वीर्य होने से पित्त शामक, लघु-रूक्ष गुण और कषाय रस से कफ शामक*
*अग्निमांद्य, अम्लपित्त, उदर विकार, रक्तपित्त, ह्रदय विकार आदि के साथ रसायन है*
*पाचन संस्थान- दीपन, अम्लतानाशक, यकृत उत्तेजक एवं अनुलोमन*
*4- गुडूची -*
*रस- तिक्त -कषाय*
*गुण - स्निग्ध - गुरू*
*वीर्य - उष्ण*
*विपाक - मधुर*
*उष्ण वीर्य और स्निग्ध गुण से वात शामक,तिक्त और कषाय रस पित्त और कफनाशक होने से इसका स्वभाव भी त्रिदोष नाशक बना है।*
*दीपन, ज्वरघ्न, रसायन, विषध्न, मूत्रजनन, बल्य*
*पाचन संस्थान - दीपन, पाचन, पित्तसारक, अनुलोमन एवं आमाश्य की अम्लता को अल्प कर देती है।*
*5- निम्ब -*
*रस - तिक्त-कषाय *
*गुण - लघु*
*वीर्य - शीत*
*विपाक - कटु*
*पित्त कफ शामक तिक्त रस के कारण, निम्ब रस प्रधान द्रव्य है, पाचन, ज्वरघ्न, शोथघ्न, दाहप्रशमन, व्रणशोधन, व्रणपाचन, कृमिघ्न, रक्तशोधक और यकृद् उत्तेजक*
*पाचन संस्थान- यकृत उत्तेजक एवं एवं पित्त के द्रव गुण का शोषण करता है जिस से अम्लपित्त रोग में बहुत अच्छा परिणाम भी देता है।*
*6- कटुकी -*
*रस - तिक्त*
*गुण - रूक्ष, लघु*
*वीर्य - शीत*
*विपाक - कटु*
*दीपन, पाचन, कफ-पित्तशामक, भेदन, लेखन, स्रंसन और विरेचन, यकृत उत्तेजक, पित्त विरेचक, ह्रदय रोग में भी लाभकारी।*
*पाचन संस्थान- दीपन, यकृत उत्तेजक, पित्त सारक एवं मात्रा में अधिक दें तो रेचन करती है।*
*7- वासा -*
*रस - तिक्त-कषाय*
*गुण - रूक्ष-लघु*
*वीर्य - शीत*
*विपाक - कटु*
*कफ पित्त शामक, श्लेष्महर, मूत्र प्रवर्तक, ज्वरहर, वेदनास्थापन, स्वेदजनन, श्वास रोग में अत्यन्त लाभकारी, ह्रद्य और विशेषकर कफ विकारों में बहुत उपयोगी।*
*पाचन संस्थान - शीत-कषाय से यह स्तंभन कर के यदि पित्त वृद्धि भी हो तो यह उसकी balancing कर देता है।*
*8- किरातिक्त - *
*रस - तिक्त-कषाय*
*गुण - लघु*
*वीर्य- शीत*
*विपाक - कटु*
*उष्ण वीर्य होने से वात-कफ शामक और तिक्त होने से कफ-पित्त शामक।ज्वरघ्न, यकृद् उत्तेजक, शोथघ्न।*
*पाचन संस्थान- दीपन, पाचन, पित्त सारक और अनुलोमन।*
*फलत्रिकादि क्वाथ' के संपूर्ण घटक द्रव्य 8 बनते हैं उनके रसादि का योग इस प्रकार बनता है ...*
*रस - मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त, कषाय पर सर्वाधिक रस तिक्त और कषाय मिलने से तिक्त-कषाय प्रधान*
*गुण - गुरू-लघु, रूक्ष-स्निग्ध*
*वीर्य - 4 द्रव्य शीत वीर्य और चार उष्ण वीर्य जिनके कारण यह क्वाथ 'अनुष्णशीत' बन गया ।*
*विपाक - 4 द्रव्यों का विपाक मधुर है और 4 द्रव्यों का विपाक कटु होने से कटु-मधुर विपाक।*
*त्रिदोष शामक प्रभाव- 8 में से सर्वाधिक 5 द्रव्य त्रिदोष शामक है और 3 द्रव्य कफ-पित्त शामक होने से यह त्रिदोषशामक है।*
*यह समान रूप से fatty liver और cirrhosis of liver जो यकृद्दाल्युदर में समाहित है, पूर्ण कार्य करता है।*
*आरोग्य वर्धिनी-
स्रोतों में संग दोष के लिये हमारी प्रिय औषध है। दीपन, पाचन, शोधन, अनुलोमन, भेदन, पित्तज और रक्तज विकार दूर करने के साथ रसायन कर्म भी करती है। इसमें 50% कुटकी है, यकृत और प्लीहा दोनों अवयवों पर बहुत प्रभावकारी है।*
*पुनर्नवा मंडूर 500 mg tds तक भी दी गई । जब यकृत गत वायरस, यकृत में शोथ, यकृदाल्युदर अथवा संक्रमण से क्षत उत्पन्न कर देते हैं, यह यकृद् शोथ में अति प्रभावकारी है।*
*कासनी के बीज*
*रस - तिक्त*
*गुण - लघु, रूक्ष*
*वीर्य - उष्ण*
*विपाक - कटु*
*कफ पित्त हर, मूत्रल, यकृत् और प्लीहा रोग, अग्निमांद्य, कामला और पित्तोदर में अत्यन्त प्रभावी।
*पाचन संस्थान- यकृत् उत्तेजक, दीपन, पित्त सारक।*
*रस-रक्त वाही स्रोतस - ह्रद द्रव में बहु उपयोगी।*
*इसके अतिरिक्त मूलक क्षार, पुनर्नवा चूर्ण, सुदर्शन घन वटी, यवक्षार आदि औषध प्रयोग भी आवश्यकता पड़ने पर किया।*
*चिकित्सा करते हुये परिणाम ये मिला..*
*8-12-25*
CAP - 310
kPa - 10.5
[2/10, 1:15 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*CAP वृद्धि का कारण बीच में औषध त्याग एवं पथ्य-दिनचर्या का पालन ना करना रहा*
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[2/10, 1:15 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*Chapter - 7*
*विस्तृत आहार-विहार एवं दिनचर्या डाइट प्लान सहित....*
*प्रातः जागरण 6:00 AM to 7:00 AM)*
*उष्णोदक पान-
गुनगुने पानी में 5-6 बूंद नींबू और चुटकी भर दालचीनी का प्रयोग। दालचीनी इंसुलिन रेजिस्टेंस कम कर आधुनिक मधुमेह से बचाती है।*
*किसी दिन नीम और हल्दी की 250 mg की 2 गोलियां यह यकृत के क्लेद को सुखाने के लिए श्रेष्ठ है।*
*कभी सो कर उठते ही आमलकी+यष्टिमधु चूर्ण साधारण जल से।*
*और किसी दिन कूष्मांड स्वरस*
*Breakfast - 8:30 AM to 9:30 AM*
*बिना तेल का चीला जौ और चने का आटा, अथवा मूंग दाल अथवा बेसन जिसमें खूब सारी कद्दूकस की हुई सब्जियां लौकी, गाजर, शिमला मिर्च आदि हो ।*
*रागी इडली या पेसरट्टू मूंग दाल का डोसा बिना नारियल चटनी के और टमाटर-लहसुन की चटनी के लिये कहा गया।रागी कैल्शियम के साथ-साथ लेखन कार्य भी करती है।*
*अंकुरित मूंग या मोठ और कभी मिलाकर, अंकुरित करने के बाद अधिक पानी में कुकर में दो सीटी लगाकर इसका पानी फेंक दीजिये और प्रयोग करें।*
*पहले अनेक रोगियों में यह uric acid increase कर देता था, इस विधि से यह uric acid border पर या normal ही रखता है।*
*बिना स्टीम दिये या उबाले बिना इनमें e.coli bacteria अति शीघ्र उत्पन्न हो जाता है।*
*मध्याह्न -11:00 AM)*
*अगर इच्छा हो तब दिया, fresh नारियल पानी अति सीमित मात्रा मे ।*
*फल मे केवल पपीता Papaya या सेब, पपीता यकृत के लिए सर्वोत्तम यकृत-उत्तेजक फल है।*
*दोपहर का भोजन - 1:00 PM to 2:00 PM*
*खाने से पहले एक बड़ा कटोरा सलाद जिसमें चुकंदर Beetroot खीरा और स्टीम की गई ब्रोकली, मौसम के अनुसार ककड़ी और मूलक भी।चुकंदर यकृत के एन्जाइम्स को सक्रिय करता है।लाल मूली जो छोटी और गोल बाजार में मिलती है वह मधुरता युक्त और सेवन के बाद दुर्गंधता रहित है।*
*अनाज के विकल्प में ब्राउन राइस या Quinoa कहा गया, क्विनोआ में उच्च प्रोटीन होता है जो यकृत की repair के लिए अनिवार्य है।चने का आटा, पुरानी जौ का आटा, मूंग दाल आटा, कुट्टू का आटा जैसे अनाज लिये गये। इनसे बनी चपाती कठोर और रूक्ष ना रहे तो इनमें लौकी उबाल कर, मूली, हल्द्वानी का आलू मिलाकर बनाने के लिये कहा जिस से टेस्ट अच्छा बन गया।*
*Roasted Bell peppers, Zucchini, मूली की पत्तों सहित सब्जी, लौकी, तोरई, टिण्डा, ग्वार फली, सेम, करेला, mix veg, कुलत्थ की दाल, मूंग और मसूर की दाल, लौकी+चना दाल, पालक+मूंग दाल का प्रयोग कराया गया।*
*कुलत्थ Horse gram स्रोतोविशोधन के लिए अद्वितीय है।*
*तक्र भुना हुआ जीरा और हींग मिला हुआ।*
*संध्या अल्पाहार 5:00 PM)*
*विकल्प 1 - मुट्ठी भर भुने हुए चने या मखाने*
*विकल्प 2 - वेजिटेबल सूप अल्प टमाटर, पालक और अदरक युक्त,अदरक अग्नि को प्रदीप्त करता है।कभी ब्रोकली या मशरूम का सूप भी दिया गया।*
*विकल्प 3 - उबले हुए मूंग नींबू और काली मिर्च के साथ।*
*रात्रि भोजन - 7:30 PM to 8:30 PM - अति लघु।*
*जौ का दलिया नमकीन या मूंग दाल की पतली खिचड़ी।*
*bfast में दी जाने वाली सामग्री अगर दिन में ना दी गई हो तो रात्रि में वो मेन्यू में ला सकते है। रूग्णा का मन करने पर multi grain आटे की bread से बने सैंडविच, सूप और तंदूरी vegetables, बहुत सारी सब्जियां, बाजरे की खिचड़ी आदि।*
*सूर्यास्त के बाद गुरू भोजन संभव हो तो अनेक रोगों में शीघ्र लाभ के लिये दाल-रोटी से बचें। भोजन के आधा घंटा बाद 100 कदम शतपावली अवश्य करें।*
*निद्रा पूर्व यदि क्षुधा का अनुभव हो तो हल्दी वाला गुनगुना पानी या बहुत कम मात्रा में मलाई उतरा हुआ दूध जिसमें चुटकी भर सोंठ मिली हो सेवन के लिये कहा। सोंठ कफ का नाश करती है और यकृत के शोथ को कम करती है।*
*अब रूग्णा रोग मुक्त है और liver fibro scan की यह report है।*
15-1-26
CAP - 243
kPa - 7.4
[2/10, 1:15 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*ग्लूकोमीटर में fasting sugar 90-100 के बीच आ रही है और शेष पैरामीटर भी सामान्य है।*
*रूग्णा अब 92 kg से 70 kg पर आ गई है।*
*यकृत रोगों में पथ्यापथ्य, आहार विहार के विषय में हम पहले बहुत कुछ पूर्व में लिख चुके हैं जो काय सम्प्रदाय के ब्लॉग पर उपलब्ध है।*
[2/10, 1:20 AM] Dr Gurudatta Anand Amin:
Apaka karya mahan hai Guruvarya.
Bahut atmvishwas badhate ho aap 🙏🙏🙏pranam
[2/10, 1:39 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma:
*यह सब गुरूजनों का आशीर्वाद और कृपा है, मेरे चिकित्सा स्थल दिल्ली में जामनगर से गुरूजन प्रो.शिव कुमार मिश्रा जी, प्रो.गुरदीप सिंह जी, प्रो. हरिशंकर शर्मा जी और काय सम्प्रदाय से जुड़ने के बाद परम आदरणीय प्रो.बनवारी लाल गौड़ जी एवं प्रो.खाण्डेल सर, प्रो. जायसवाल जी आदि सब के चरण यहां पड़े और आशीर्वाद दे कर गये हैं।*
*जो कुछ गुरूजनों से मिला और सीखा वही काय सम्प्रदाय में बांट रहे हैं, बाकी आप सभी मित्रों का सहयोग लेखन के प्रति उत्साह वर्धन कर देता है।*
🌹❤️🙏
[2/10, 1:40 AM] Prof.Vd.Arun Rathi:
*प्रणाम गुरुवर*
🙏🙏🙏
*तुसी ग्रट हो*
*आपके व्दारा प्रस्तुत आयुर्वेद के मौलिक सिद्धांत एवं चिकित्सा सूत्र का प्रायोगिक पक्ष मस्तिष्क पटल पर छप जाता है*
🙏🙏🙏
[2/10, 1:58 AM] Prof. Madhava Diggavi Sir:
Dhanyawad sir !
[2/10, 6:58 AM] pawan madan Dr:
Pranam Guruvar !
Shubhashish v maargdarshan ke liye bahut bahut dhanyawad 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
[2/10, 8:15 AM] Dr Divyesh Desai:
🙏🏾🙏🏾कोटि कोटि प्रणाम, गुरुश्रेष्ठ
🙏🏾🙏🏾
ग्रेट Clinician एवं Academician दोनोंकी श्रेष्ठता को अंतःकरण से नमन🙏🏾🙏🏾
[2/10, 12:47 PM] Vd.Vinod Sharma:
अति उत्तम विश्लेषण 👌👌👌
सिद्धांत और चिकित्सा सहित पथ्य अपथ्य का पूर्ण विवरण प्रेरणा दायक और चिकित्सा में विश्वास वर्धन करता है |
आभार सहित 🙏🙏🙏
[2/10, 12:51 PM] Dr Mansukh R Mangukiya Gujarat:
🙏प्रणाम गुरुवर !
आज ज्ञानगंगा की बौछार हो गई।
[2/10, 11:29 PM] Vd. Atul J. Kale:
*गुरुजी शास्त्रीय विचार कैसे करे ये परिपाठ हम आपसे सीखते आए है। मूलगामी निदान और उसके ऊपर चिकित्सा तत्त्व कैसे होना चाहिए इसकी गहन चर्चा आप नित्य करते है इसलिए आपका सहृदय धन्यवाद।* 😊🙏🏻🙏🏻🙏🏻
आयुर्वेद ये शास्त्र ही ऐसा है कि न उसकी कोई परिसीमा हम सीमित कर सकते है। हर सूत्र पर पूरे जैसी भावना हो सकती है। फिर भी हम जब ऐसा सोचते है कि हम सब जानते है तो ऐसा होता भी नहीं है। किन्तु गुरुजी आपकी निदान चिकित्सा-युक्ति परिपूर्ण प्रतीत होती है। आयुर्वेद परिपूर्ण होन के लिए आयुर्वेद ने ही कतिपय दार्शनिक सिद्धान्तों को आत्मसात किया है। इन्हीं सिद्धान्तों को आप भिन्न भिन्न दृष्टि से देखते है, समझते है। यदि चिकित्सा में सिद्धांत है ही नहीं तो चिकित्सा का औचित्य ही नहीं रहता। किन्तु अप्रत्यक्ष रूप में हम सिद्धांतों का उपयोग करते भी है, किन्तु बहुत बार हमारे मस्तिष्क में जो औषधि रहती है ओ बाहर तुरंत आती है। इस अवस्था से मैं जब गुजर रहा था तब कुछ गलत हो रहा है ये संवेदना होने लगी।
जब आयुर्वेद के लिए रुग्ण आता है तो परीक्षा के पश्चात औषधियों का प्रावधान होता है। इसी परीक्षा में सब युक्ति आदि प्रमाण सन्निहित रहते है। यहां जो भी केस आते है उसकी हर संभव चिकित्सा उजागर होती है। हर गुरुजन का एक भिन्न विचार रहता है जो औषधियों से उजागर हो ऐसा जरूरी नहीं। इसीलिए चिकित्सा का विचार एवं युक्ति प्रस्तुत होनी चाहिए जो गुरुजी नित्य लिखते है।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
[2/10, 11:41 PM] Prof. M. L. Jaysawal Sir:
ऊँ !
सादर प्रणाम मान्यवर वैद्यराज जी
अद्भुत अनुभवात्मक शास्त्रोक्त प्रयोग विवेचन।
शुभरात्रिजी !
[2/11, 4:21 AM] Sanjay Chhajed Dr.
Mumbai: Pippali is very good hepatoprotective and regenerates the damaged hepatic architecture. Sir , when i use pippali in vardhaman prayog , i have simulteneously increased quantity of milk. I have also observed that if we add cow ghee ½tsf in one cup of milk while creating pippali ksheerpak along with water, it provides better result. It is probably because piperdine is fat soluble .
[2/11, 4:28 AM] Sanjay Chhajed Dr.
Mumbai: Adding ghee and increasing quantity of milk not only satisfies the increased hunger but also reduces the effect of teekshna , ushna guna.
[2/11, 6:09 AM] Prof. M. L. Jaysawal Sir:
ऊँ !
साथ ही आपादभद्रा प्रभाव का भी
समाधान है।
👏
[2/11, 6:20 AM] Sanjay Chhajed Dr. Mumbai:
Pranam gurudev !
****************************************************************************************************************************************************************************************************************************Above case presentation & follow-up discussion held in 'Kaysampraday (Discussion)' a Famous WhatsApp group of well known Vaidyas from all over the India.****************************************************************************************************************************************************************
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