Case-presentation: Decoding the mystery of 'PANCHMAHABHUTA' (5 elements) - Practical integration of Macrocosm-microcosm principle and clinical dynamics — पंचमहाभूतों के रहस्य का अनावरण - पिण्ड-ब्रह्माण्ड न्याय और व्यावहारिक चिकित्सा का एकीकरण by Vaidyaraj Subhash Sharma & follow up discussion with Prof. Arun Rathi, Prof. Giriraj Sharma, Vd. Dinesh Katoch, Vd. Pawan Madan, Vd. Divyesh Desai, Vd. Bhadresh Nayak and others.
*Part 1- Decoding the mystery of PANCH-MAHABHUTA (5 elements)- Practical integration of Macrocosm-microcosm principle and clinical dynamics-
पंचमहाभूतों के रहस्य का अनावरण - पिण्ड-ब्रह्माण्ड न्याय और व्यावहारिक चिकित्सा का एकीकरण*
*संहिता-सूत्र बीज क्रैकिंग कोड (Samhita-Sutra Beej Cracking Code)*
*Vaidyaraja Subhash Sharma*
*M.D (kaya chikitsa- Gujarat Ayurveda Uni.- jamnagar 1985)*
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*अगस्त 2026 में शास्त्रोक्त आयुर्वेदीय चिकित्सा के 44 वर्ष पूर्ण हो गये हैं, इतने वर्षों का अनुभव, गुरूजनों एवं शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान और इस श्रंखला में उनका संदर्भ इस प्रकार है…*
>*चरक संहिता एषणा व्याख्या- प्रो.बनवारीलाल गौड़ जी,
सूत्रस्थान:
अध्याय 1 (दीर्घञ्जीवितीय अध्याय- सम्भाव्य क्षमता, समवाय, आयु का एकीकरण),
अध्याय 11 (तिस्रैषणीय अध्याय- प्रज्ञापराध, सत्व-ज्ञान),
अध्याय 28 (विविधाशितपीतीय अध्याय- धातु-पोषण और ओजस)।
शारीरस्थान:
अध्याय 1 (पुरुषविचय- अव्यक्त पुरुष, स्व-संदर्भ, चेतना धातु)।
चिकित्सास्थान:
अध्याय 1 (रसायन पाद- अमृतत्व, कायाकल्प और पुनर्जन्म)।
>सुश्रुत संहिता,
सूत्रस्थान
अध्याय 15 (दोषधातुमलक्षयवृद्धि विज्ञानीय - पूर्ण व्यवस्था, धातु साम्य), अध्याय 21 (व्रणप्रश्न - षट् क्रियाकाल/अव्यक्त अवस्था),
अध्याय 15/41 (स्वास्थ्य परिभाषा - प्रसन्नता/आनंद)
शारीरस्थान
अध्याय 4 (गर्भव्याकरण- आनु- वंशिकी, अव्यक्त-सम्भूति)।
>अष्टांग हृदयम् / अष्टांग संग्रह (आचार्य वाग्भट)
सूत्रस्थान:
अध्याय 1 (आयुष्कामीय- वात की गतिशीलता, शोधन, व्याधिक्षमत्व), अध्याय 11 (दोषादि विज्ञानीय)।
>शांगधर संहिता (पंडित शांगधराचार्य)
प्रथम खंड
अध्याय 3 (नाड़ी परीक्षा- स्पंदन, अनुनाद और लयबद्धता)।
>दर्शन ग्रंथ एवं वैदिक साहित्य ये ग्रंथ इन गुणों के दार्शनिक, सूक्ष्म और चेतना आधारित पक्षों को वैज्ञानिक प्रामाणिकता प्रदान करते हैं जैसे पातंजल योग सूत्र (महर्षि पतंजलि) समाधि पाद व साधन पाद ऋतंभरा प्रज्ञा, समत्व, सत्वावजय, अनंत मौन/प्रशम)।*
>*न्याय एवं वैशेषिक दर्शन महर्षि कणाद व गौतम से हमने समझा सामान्य, विशेष, समवाय सिद्धांत, विभुत्व या non-locality और कारण-कार्य सिद्धांत।*
>*सांख्य दर्शन महर्षि कपिल से त्रिगुण सिद्धांत सत्व, रज, तम, अव्यक्त से व्यक्त की सृष्टि-प्रक्रिया synthesis & creativity*
>*श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 2 सांख्ययोग - समत्व, धीरता, स्थितिप्रज्ञता,
अध्याय 13 क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग - लोक-पुरुष साम्य।*
*1990-91 में हमारा साथ हॉलैंड में महर्षि महेश योगी जी के साथ रहा जहां गुरूमुख से सामने बैठ कर ऐसे ही विषयों पर गंभीर चर्चा रहती थी जिस पर बनाये नोट्स आज भी प्रकृति के गुणों पर काम आते है जिनका आगे हमने clinical practice में प्रयोग और अनुभव जन्य ज्ञान से विस्तार कर उनकी संख्या का बहुत वर्धन कर दिया है।*
*आयुर्वेद की नवीन पंक्ति Gen G के लिये हम चिकित्सोपयोगी technical english शब्द भी अनेक स्थलों पर दे कर चले हैं जिस से विषय सरल लगे।*
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*हमारा यह अनुसंधान कार्य वह केवल सिद्धांतों का मिलाजुला रूप नहीं है, बल्कि चेतना (Unified Field/Nature) ➔ ब्रह्मांड (Universe/Macrocosm) ➔ पंचमहाभूत (Five Elements) ➔ पिण्ड/शरीर (Microcosm) ➔ 35 क्लिनिकल तत्व का एक सुव्यवस्थित और प्रामाणिक सूत्र (Flowchart) है।*
*पिण्ड-ब्रह्माण्ड न्याय और पंचभौतिकता का व्यावहारिक एकीकरण-
"यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके।"
चरक संहिता,शारीरस्थान 5/3
अर्थात जो भी भाव विशेष (गुण, घटक व शक्तियां) इस बाह्य ब्रह्मांड/प्रकृति में विद्यमान हैं, वे सभी इस मानव पिण्ड (शरीर) में भी उपस्थित हैं।*
*प्रकृति (nature/unified field) की जिन 35 सूक्ष्म क्षमताओं (35 qualities) का हमने अध्ययन किया है, वे ब्रह्मांड में पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) और चेतना (आत्मज भाव) के माध्यम से व्यक्त होती हैं। जब वही पंचमहाभूत हमारे इस भौतिक शरीर (पिण्ड) में आते हैं तो वे केवल दार्शनिक विचार न रहकर 35 नैदानिक व चिकित्सकीय तत्वों (evidence-based clinical attributes) का रूप ले लेते हैं।*
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*इसे निम्नलिखित 3 चरणों में सहजता से समझा जा सकता है….*
*1. अव्यक्त/प्रकृति स्तर (macro-cosmic nature)-
एकीकृत क्षेत्र (unified field) के वे 35 मूल गुण जो सृष्टि के संचालन, गतिशीलता, व्यवस्था और पोषण का नियम बनाते हैं।*
*2. पंचमहाभौतिक अभिव्यक्तित स्तर (elemental bridge) -
प्रकृति के वे गुण पंचमहाभूतों में ढलते है….*
*आकाशीय भाव (space & channels)*
*वायव्य भाव (movement & neural signals)*
*तैजस भाव (energy & metabolism)*
*आप्य भाव (fluids & cohesion)*
*पार्थिव भाव (structure & stability)*
*आत्मज/चेतना भाव (intelligence, memory & bliss)*
*3. पिण्ड/शरीर स्तर (micro-cosmic clinical application) -
जब ये पंचमहाभूत शरीर में कार्य करते हैं तो वही 35 गुण हमारी होमियोस्टेसिस (homeostasis), रोगोत्पत्ति (pathogenesis), नाड़ी परीक्षा (pulse diagnosis) और शोधन-शमन चिकित्सा के रूप में प्रत्यक्ष (clinical presentation) दिखाई देते हैं।*
*संक्षेप में पिण्ड-ब्रह्माण्ड न्याय एवं पंचभौतिक संगठन का हमारा यह प्रयास 'यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे' के मूलभूत न्याय पर ही आधारित है । प्रकृति (nature/unified field) की संपूर्ण 35 गुणवत्तापूर्ण क्षमताएं (35 qualities) पहले पंचमहाभूतों और आत्मज भावों में अभिव्यक्त होती हैं और वही पंचमहाभूत जब मानव पिण्ड (शरीर) का निर्माण करते हैं, तो 35 व्यावहारिक चिकित्सीय तत्वों (clinical elements) का रूप ले लेते हैं। अतः यह विश्लेषण प्रकृति (nature), पंचमहाभूत (elements) और पिण्ड (body physiology) का एक वैज्ञानिक व साक्ष्य-आधारित एकीकरण है जो विभिन्न case presentations के साथ लिख रहे हैं।*
*रोगी - 40 वर्ष/ IT job/ वैवाहिक जीवन समाप्त/ body wt. 76 kg/ अनियमित दिनचर्या एवं आहार जिसमें प्रायः मद्यपान भी*
*लक्षण- आलस्य, गौरव, अंग शैथिल्य, मल त्याग के पश्चात भी असंतुष्टि, आध्मान*
15-6-26
SGOT- 155.00 U/L (उच्च)
SGPT - 119.80 U/L (उच्च)
GGT - 280.20 U/L (अत्यधिक उच्च)
CHOLESTEROL - 208 mg/dL (उच्च)
TRIGLYCERIDES - 345 mg/dL (अत्यधिक उच्च)
VLDL - 69.00 mg/dL (उच्च)
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*इस रोगी को meditation, रसोन हरीतकी, फलत्रिकादि क्वाथ, आरोग्यवर्धिनी वटी और रात्रि में कुटकी चूर्ण दिया गया।*
*चिकित्सा तो 'पुरूषं पुरूषं वीक्ष्य' ही दी जाती है पर इस प्रकार की reports और लक्षणों के रोगी अनगिनत संख्या में मिलेंगे, यदि आप औषध भी ऐसे देंगे लाभ भी मिलेगा पर वो चिकित्सा लाभ मिला कैसे, उसके पीछे के भाग रोग, रोगी, औषध, meditation, आहार, विहार और दिनचर्या आदि में मूल घटित क्या हुआ ? अगर यह समझ आ जाये तो फिर गंभीर से गंभीर रोगों को भी सरलता से साधारण रोग बनाया जा सकता है।*
*एक ही रोग की चिकित्सा अनेक प्रकार से की जा सकती है पर मिलेंगे पंचमहाभूत युक्त प्रकृति यानि nature ही जिसके clinical ज्ञान का अभाव ही दुविधा ग्रस्त बना देता है।इसे विभिन्न आयामों से जानेंगे, अधिकतर रोगों के हेतु पहले मन में आ रहे है जैसे अधिक मीठा आहार सेवन का आहार, जो action mode में आ कर शरीर में जायेगा और मन भी पंचभौतिक है।*
*अभी तक हम ऐसे cases को इस प्रकार समझते आये है जैसे- यकृत-विकृति (Elevated LFT) एवं मेदोदोष (Hyperlipidemia)*
*LFT एवं Lipid Profile के घटकों की पंचभौतिकता…*
*LFT घटकों की पंचभौतिकता में यकृत/अग्नि एवं पित्त का विचार किया जाता है।*
*Liver Enzymes SGOT/SGPT/ ALT, GGT -
ये सब यकृताग्नि एवं पाचक अग्नि महाभूत के सूचक हैं। जब यकृत की कोशिकाओं में शोथ या अति-उष्णता जैसे अग्नि/पित्त की वृद्धि होती है तब ये एंजाइम रक्त में स्रवित होते हैं।*
*Bilirubin Total & Direct/ Indirect यह रंजक पित्त का प्रतीक है जिसमें अग्नि एवं जल महाभूत का आधिक्य होता है।*
*Proteins Albumin,Globulin ये रसादि धातुओं के पोषण एवं जल तथा पृथ्वी महाभूत के सूचक हैं जो शरीर में धारणात्मक एवं संरचनात्मक कार्य करते हैं।*
*Lipid Profile घटकों की पंचभौतिकता जिसमें मेद धातु एवं कफ का विचार प्रमुख है।*
*Cholesterol एवं Triglycerides, यह मेद धातु तथा स्नेह का प्रतीक है जो पृथ्वी एवं जल महाभूत प्रधान है। जब शरीर में मेदोधात्वाग्नि मंद होती है, तो स्नेहांश अर्थात कफ/मेद बढ़कर स्रोतस में संचित होने लगता है।*
*VLDL एवं LDL इनमें पृथ्वी + जल महाभूत के घनत्व, स्थूलता, गुरुता का अति स्राव होता है, जो धमनियों में 'स्रोतोरोध' उत्पन्न करता है।*
*HDL यह अग्नि + वायु महाभूत से युक्त सूक्ष्म मेद अंश माना जा सकता है जो अतिरिक्त मेद को यकृत में लाकर पाचन में सहायता करता है।*
*इस रोगी और इसकी चिकित्सा पर हम प्रकृति के 35 गुणों को स्पष्ट करने के बाद चर्चा करेंगे।*
*लेकिन इतनी reports सही आने क्या यह रोगी स्वस्थता की और अग्रसर या कुछ तो स्वस्थ मान लिया जायेगा !
इसका उत्तर है नहीं ।
'यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके इति; बुधास्त्वेवं द्रष्टुमिच्छन्ति’
च शा 4/13
पर प्रो.बनवारीलाल गौड़ जी की ‘एषणा’ व्याख्या ‘लोक-पुरुषसाम्य– इस प्रकार यह पुरुष लोक (संसार) के समान है। निःसन्देह संसार में जितने मूर्तिमान् (स्वरूप वाले) भावावशेष हैं उतने ही भावावशेष पुरुष में भी हैं, और जितने भावावशेष पुरुष में पाये जाते हैं उतने ही लोक (संसार) में भी होते हैं। विद्वान् (सम्यक् ज्ञानवान्, मोक्षयुक्त) पुरुष ऐसा ही देखना चाहते हैं।*
*एषणा– यह शरीर की भूतविकार युक्तता लोक की समता से ज्ञात होती हुई परम अभीष्ट मोक्ष की भी कारण होती है। इस लोक-साम्य (लोक से समता) को प्रदर्शित करते हुए कहते हैं – एवमयमित्यादि। ‘एवम्’ इसका तात्पर्य है – ‘पञ्चभूतविकारमय होने से’। ‘लोकसम्मितः’ अर्थात् ‘लोकतुल्य’ (संसार के समान)। और यहाँ शरीर को जो भूतविकारमय कहा गया है, इससे भूतविकारमय होने के बारे में लोक एवं पुरुष (इन दोनों) का सादृश्य (समानता) बताया गया है, और जो लोक एवं पुरुष (इन दोनों) की आध्यात्मिक समानता पुरुषविषय शरीर में कही जानी है, वह भी यहाँ अनुक्त भी ‘यावन्तो हि’ इत्यादि विशेष के अभिधान (कथन) से सूचित जाननी चाहिए।*
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*इससे जितने आध्यात्मिक भावावशेष अर्थात् अन्तरात्मा, मन, अहङ्कार आदि अथवा भौतिक अर्थात् मूर्ति (घन), क्लेद (गर्भोदक) आदि हैं, वे पुरुषगत होते हुए भी लोक से भी समान ही हैं, यह समझना चाहिए। और लोक एवं पुरुष (इन दोनों) की समानता का वर्णन मुमुक्षुओं (मोक्ष को चाहने वालों) के लिए ही उपयुक्त है, यह दर्शाते हुए कहते हैं– बुधास्त्वेवमित्यादि। ‘बुधाः’ अर्थात् ‘सम्यग्ज्ञानयुक्त, मोक्षयुक्त इतना’। और लोक एवं पुरुष की समानता का वर्णन मोक्ष के लिए ही यह पुरुषविषय शरीर में स्वयं ही कहेंगे।*
*यह पढ़ कर समझने में शायद आपको कठिन लग रहा है पर यह सिद्धांत केवल दर्शन का विषय नहीं है बल्कि आधुनिक clinical practice में diagnosis, pathophysiology और treatment का सबसे व्यावहारिक आधार है।*
*1. लोक-पुरुष साम्य -
‘लोकसम्मितः पुरुषः’ (जितने भाव लोक में हैं, उतने ही पुरुष/शरीर में हैं)*
*सूक्ष्म एवं आध्यात्मिक - micro level*
*लोक में - परमात्मा/ईश्वर, प्रकृति, अहंकार, मन आदि।*
*पिण्ड (शरीर) में - अन्तरात्मा, बुद्धि, अहङ्कार, मन*
*प्रायोगिक अर्थ -
जैसे संसार में बिना सूक्ष्म चेतना या ऊर्जा के कोई क्रिया संभव नहीं है वैसे ही शरीर में केवल भौतिक organs काम नहीं करते, बल्कि उनके पीछे neuro-psychological अर्थात मानसिक एवं आध्यात्मिक कारक काम करते हैं।*
*भौतिक एवं स्थूल समानता - macro & physical level -*
*लोक में - पर्वत/पृथ्वी (घन रूप), नदियां/समुद्र (क्लेद/द्रव रूप), सूर्य (ऊष्मा), वायु (गति), आकाश (स्थान)*
*पिण्ड (शरीर) में -solid structures अर्थात मूर्त भाव,bones, muscles, tissues,fluids या क्लेद जनित blood, plasma, amniotic fluid, cellular fluid*
*अग्नि, वायु, आकाश - metabolism (पित्त), nerve impulses व peristalsis (वात), और body cavities (आकाश)*
*आयुर्वेद क्षेत्र में बहुधा आधुनिक चिकित्सा को जो आधार बना कर चलते है चिकित्सकों के लिए यह व्याख्या निम्नलिखित चार व्यावहारिक सूत्रों के रूप में समझी जा सकती है -*
*environmental physiology एवं epigenetics - सिद्धांत - जब बाहरी environment में बदलाव होता है, तो उसका सीधा प्रभाव शरीर के आंतरिक homeostasis पर पड़ता है।*
*clinical application- circadian rhythm जैसे रात में melatonin का बढ़ना और दिन में cortisol का बढ़ना यह लोक-पुरुष साम्य ही है।*
*seasonal affective disorder या संधिवात/आमवात - ठंड या नमी जैसे वर्षा ऋतु बढ़ते ही संधियों में शोथ एवं शूल बढ़ जाता है। चिकित्सक को केवल painkillers देने के बजाय बाहरी environment जैसे शीत या आर्द्रता नमी के विपरीत heat/warmth therapy देनी चाहिए।*
*समान और विपरीत का clinical rule - आचार्य चक्रपाणि की टीका के अनुसार लोक और पुरुष दोनों पंचमहाभूतविकारमय हैं।*
*नियम - यदि environment से कोई गुण जैसे dryness, extreme heat शरीर में जाता है, तो वह शरीर के उसी गुण को बढ़ा देता है।*
*clinical application - dehydration जैसे शरीर में water/fluid की कमी होने पर बाहरी लोक से water and salts (ORS) देना।*
*inflammation/hyperacidity (पित्त/अग्नि की वृद्धि) होने पर बाहरी लोक से antacids/cooling agents देना।*
*mind-body medicine (psychosomatic disorders -*
*आचार्य चक्रपाणि जी ने स्पष्ट किया है कि अंतरात्मा, मन और अहंकार भी लोक के समान ही कार्य करते हैं।*
*clinical application -
आधुनिक चिकित्सा में IBS (irritable bowel syndrome), hypertension और eczema जैसे रोगों को psychosomatic (mind-body) माना जाता है। यदि mind में stress या distortion है, तो उसका असर सीधे gut और skin पर दिखता है। अतः चिकित्सा केवल body की नहीं, बल्कि mind (psychotherapy/meditation) की भी करनी होगी।*
*मोक्ष और समता का व्यावहारिक अर्थ- preventive medicine & wellness-*
*व्याख्या में कहा गया है कि यह समानता मुमुक्षुओं (मोक्ष चाहने वालों) और सम्यग्ज्ञानयुक्त चिकित्सकों के लिए है।*
*प्रायोगिक अर्थ -
चिकित्सा का अंतिम लक्ष्य केवल disease symptoms को दबाना नहीं है बल्कि व्यक्ति को nature के साथ balance में लाना है। जब patient अपने diet and lifestyle को nature के नियमों जैसे day cycle, seasonal cycle के अनुकूल कर लेता है तो body disease free और mind stress free हो जाता है।*
*शरीर बाहर के संसार से अलग कोई isolated island नहीं है। यदि एक चिकित्सक patient का इलाज करते समय केवल शरीर के organs को अलग से न देखकर patient के diet, lifestyle, weather, mental state और external environment (internal & external environment) का balance बनाकर इलाज करता है तो वही वास्तव में 'लोक-पुरुष साम्य न्याय' का सफल practical application कर रहा है।*
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*इस पंचभौतिकता और प्रकृति के प्रायोगिक 35 गुण जो हमें इस ब्रह्माण्ड और पिण्ड में सर्वत्र मिलते हैं और उनकी गुणवत्ता, यह आयुर्वेद और चेतना-विज्ञान का एक सर्वव्यापी संरचना (universal matrix) है।*
*पिण्ड-ब्रह्माण्ड न्याय (लोक-पुरुष साम्य) का अर्थ ही यही है कि ये 35 गुण प्रकृति के मौलिक नियम (fundamental laws of nature) हैं। रोगी चाहे किसी भी बीमारी का हो, चाहे वह जीर्ण वृक्कौ दुष्टि (ckd) हो, ऑटोइम्यून रोग (rheumatoid arthritis/आमवात), मधुमेह, अवसाद (depression) या फिर कोई आपातकालीन अवस्था ये गुण हर रोग और हर अवस्था में समान रूप से लागू (apply) होते हैं।*
*35 गुणों की सार्वभौमिकता (universality of 35 qualities) -*
*जैसे भौतिक विज्ञान (physics) के गुरुत्वाकर्षण (gravity) का नियम सेब पर भी लागू होता है और ग्रहों की गति पर भी, वैसे ही यह 35 गुणों की सार्वभौमिक संरचना…..*
*cell——patient——macrocosm*
*हमने वर्षों के अनुभव के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि यह तीनों स्तरों पर एक ही समय में काम करता है।*
*जब हम इस मैट्रिक्स को किसी भी नए रोगी पर लागू करते हैं तो केवल 3 प्रश्नों का ज्ञान आवश्यक होता है….*
*1 - इस रोगी में 35 गुणों में से कौन-कौन से गुण भंग या corrupted हुए हैं ?*
*2 - कौन से महाभूत और दोष के कारण यह गुण टूटा है ?*
*3 - किन औषधियों, आहार और चेतना (ध्यान/सत्वावजय) से यह गुण पुनः स्थापित या restored हो सकता है ?*
*इसी को हम संहिता सूत्र बीज क्रैकिंग कोड (samhita sutra beej cracking code) अनेक सिद्धान्तों में एक भाग कहते हैं जो हर रोग की सम्प्राप्ति को कुछ क्षण में डिकोड कर देता है।*
*इन 35 गुणों को स्पष्ट करते हैं…*
*A - चेतना, मूल क्षमता एवं आनुवंशिकी-
(potential, epigenetics & cause )-*
*1- प्राकृतिक नियम की संपूर्ण क्षमता total potential of natural law -*
*संस्कृत एवं शास्त्रीय नाम - सर्वसमवाय अथवा प्राकृतिक साम्य*
*मूल संदर्भ-
सर्वं सर्वदा सर्वथा सम्भवति - च शा 6/19
यह पूर्ण श्लोक का एक अंश है जो इस प्रकार भी लागू होता है अर्थात किसी भी रचना को बनाने की पूरी क्षमता का एक ही स्थान पर उपस्थित होना।*
*उदाहरण -
जिस प्रकार एक सूक्ष्म बीज में विशाल वटवृक्ष का संपूर्ण नक्शा छिपा होता है, उसी प्रकार शुक्राणु और डिंब (zygote) में संपूर्ण मानव शरीर का विकास क्रम निहित रहता है।*
*चिकित्सीय उपयोग-
यह त्रिगुण साम्य और आनुवंशिक क्षमता (genetic code) है। गर्भाधान से पूर्व शुक्र-शोणित की शुद्धि इसी क्षमता को जागृत करने के लिए की जाती है।*
*2- अनंत संगठनात्मक शक्ति - infinite organizing power -*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - महाप्रज्ञा / जैविक प्रज्ञा*
*मूल संदर्भ -
बुद्धिः कर्मानुसारिणी / प्रज्ञावर्धनम्*
*अर्थ - बिना किसी बाहरी संचालक के अरबों जटिल कार्यों को एक साथ सही ढंग से चलाने की शक्ति।*
*उदाहरण:
शरीर में अरबों कोशिकाएं हैं,यकृत (liver) डिटॉक्स कर रहा है, हृदय पंप कर रहा है और फेफड़े ऑक्सीजन ले रहे हैं पर सब एक साथ बिना टकराए चल रहा है।*
*चिकित्सीय उपयोग -
इसे जैविक प्रज्ञा या biogenetic intelligence कहते हैं। चिकित्सा का काम शरीर की इस संगठनात्मक शक्ति को जगाना है उसमें बाधा डालना नहीं।*
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*3- स्वयं में पूर्ण जाग्रत - fully awake within itself -*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - स्व-चैतन्य / स्व-संवित्*
*मूल संदर्भ -
“चेतना धातुः / चेतनावन्तं देहम्"*
*अर्थ -
शरीर का अपने भीतर होने वाली हर गतिविधि से हर पल परिचित रहना।*
*उदाहरण -
त्वचा में कांटा चुभते ही या शरीर में कोई वायरस प्रवेश करते ही प्रतिरक्षा प्रणाली (immunity) तुरंत सक्रिय हो जाती है।*
*चिकित्सीय उपयोग -
यह homeostatic awareness है। वैद्य जब अग्नि को प्रदीप्त करता है तो शरीर स्वयं अपनी समस्याओं को पहचान कर ठीक करने लगता है।इसीलिये कहते हैं कि अग्नि की चिकित्सा ही काय चिकित्सा है।*
*4- अनंत सहसंबंध- infinite correlation-*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम: समवाय / सार्वत्रिक अंतर्संबंध*
*मूल संदर्भ -
“शरीरम् अपि चेतनाधातुरधिष्ठानम्"*
*अर्थ -
शरीर का हर भाग दूसरे हर भाग से गहराई से जुड़ा होना।*
*उदाहरण -
मानसिक तनाव brain में होने पर उदर gut हो जाना, जिसे आधुनिक विज्ञान gut-brain axis कहता है।*
*चिकित्सीय उपयोग -
आयुर्वेद कभी भी किसी अंग का पृथक इलाज नहीं करता; यह "समदोषः समाग्निश्च..." के अनुसार पूरे शरीर के अंतर्संबंधों को देखकर चिकित्सा करता है।*
*5- स्व-संदर्भ self-referral-प्रज्ञापराध-विगच्छ / स्व-स्थता)*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम -स्व-लक्षण / आत्म-ज्ञान*
*मूल संदर्भ-
“धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत् कुरुतेऽशुभम्। प्रज्ञापराधं तं विद्यात्..."*
*अर्थ -
कोशिकाओं की अपने और पराये की पहचान करने की क्षमता।*
*उदाहरण -
शरीर अपनी कोशिकाओं को हानि नहीं पहुँचाता केवल बाहरी बैक्टीरिया या वायरस पर हमला करता है।*
*चिकित्सीय उपयोग-
जब स्व-संदर्भ का गुण बिगड़ता है तो autoimmune diseases उत्पन्न होती हैं जिसे आचार्य चरक ने प्रज्ञापराध कहा है, इसके उदाहरण autoimmune diseases / amavata / psoriasis आदि हैं ।आधुनिक विज्ञान में इसे हम कहते हैं "immune system losing self-recognition" या प्रतिरक्षा प्रणाली का अपनों को पहचानना भूल जाना । आयुर्वेद में यह प्रज्ञापराध है । शरीर की कोशिकाएं अपनी ही धातुओं पर हमला करने लगती हैं ।*
*जब हम 'सत्वावजय चिकित्सा' और 'रसायन द्रव्यों' (जैसे गिलोय, ब्राह्मी) का प्रयोग करते हैं, तो प्रतिरक्षा प्रणाली पुनः 'स्व-संदर्भ' (self-referral) अवस्था में लौटती है और अपनों-परानों का भेद समझकर स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करना बंद कर देती है।*
*6- लचीलापन / अनुकूलनशीलता - plasticity / adaptability*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - सात्म्य / देश-काल सात्म्य*
*मूल संदर्भ -
“सात्म्यं नाम तत् यद आत्मन्युपशेते"
चरक विमान 1/20*
*अर्थ-
परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेने की क्षमता।*
*उदाहरण-
पहाड़ पर जाने पर शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं RBCs का स्वतः बढ़ जाना या मस्तिष्क की चोट के बाद दूसरे हिस्सों का काम संभाल लेना (neuroplasticity)।*
*चिकित्सीय उपयोग -
इसे आयुर्वेद में सात्म्य (adaptation) कहते हैं। रोगी की सात्म्यता देखकर ही औषध और आहार की मात्रा तय की जाती है।*
*B - गतिशीलता, सृजन और सूक्ष्म चयापचय
(dynamics, creation & metabolism….)*
*7- पूर्ण व्यवस्था- perfect orderliness*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम दोष-धातु-मल साम्य*
*मूल संदर्भ-
“दोषधातुमलमूलं हि शरीरस्य"
सुश्रुत संहिता*
*अर्थ -
हर तत्व का अपने सही स्थान, मात्रा और समय पर होना।*
*उदाहरण -
रक्त का pH हमेशा 7.35–7.45 के बीच ही रहता है, इससे थोड़ा भी भटके तो जीवन संकट में पड़ जाता है।*
*चिकित्सीय उपयोग-
यह दोष-धातु-मल का साम्य है। चिकित्सा का अंतिम लक्ष्य इसी व्यवस्था को नियमित बनाये रखना है। मधुमेह type 2 diabetes mellitus में जब अग्न्याशय (pancreas) और धात्वाग्नि का सामंजस्य बिगड़ता है, तो इंसुलिन और शर्करा (glucose) का प्रबंधन अव्यवस्थित हो जाता है ।*
*वसंतकुसुमाकर रस या अन्य प्रमेहहर चूर्ण द्वारा जब धात्वाग्नि और कफ-मेद का संशोधन किया जाता है तो शरीर में कार्बोहाइड्रेट चयापचय (metabolism) में पुनः 'पूर्ण व्यवस्था' स्थापित होती है।*
*8- अनंत गतिशीलता - infinite dynamism*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - वायु/वात गुण (चलत्व)*
*मूल संदर्भ -
“पित्तं पंगु कफं पंगु पंगवो मलधातवः। वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत्॥"*
*अर्थ -
बिना रुके निरंतर चलने वाली सूक्ष्म और स्थूल गतियाँ।*
*उदाहरण -
हृदय का बिना थके जीवनभर धड़कना, तंत्रिका तंत्र (nervous system) में विद्युतीय तरंगों का दौड़ना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
यह वात दोष का 'चल' गुण है। यदि गति रुके तो 'अवरोध' होता है, जिससे वेदना और पक्षाघात जैसे रोग भी उत्पन्न हो जाते हैं।*
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*9- अनंत सृजनात्मकता - infinite creativity*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - धातु-परिणाम / आग्नेय व्यापार*
*मूल संदर्भ -
रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदस्ततो ऽस्थि च...*
*अर्थ -
पुरानी चीज़ों से निरंतर नई चीज़ों का निर्माण करते रहना।*
*उदाहरण:
त्वचा की ऊपरी परत का छिल जाना और कुछ ही दिनों में नई त्वचा का आ जाना।*
*चिकित्सीय उपयोग-
यह धातु-परिणाम (metabolism) और आग्नेय क्रिया है। रसादि धातुओं का उत्तरोत्तर निर्माण इसी सृजनात्मकता का परिणाम है।*
*क्रॉनिक किड्नी डिसीज़ (ckd) / यकृत का जीर्णोद्धार का एक उदाहरण देखिये, जब वृक्कौ (kidney) या यकृत की कोशिकाएं (nephrons /hepatocytes) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तो शरीर के भीतर 'अनंत सृजनात्मकता' का गुण क्षीण हो जाता है।*
*पुनर्नवा, गोक्षुर और रसायन चिकित्सा द्वारा शरीर की stem-cell capacity और tissue regeneration क्षमता जागृत होती है जिससे नई स्वस्थ कोशिकाओं का पुनर्जन्म (creative regenerat ion) होता है ।*
*10- अनुनाद / स्पंदन-सामंजस्य - resonance / vibrational coherence*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - स्पंदन-साम्य / नाड़ी-गति*
*मूल संदर्भ -
नाड़ी गतेः सूक्ष्मा...
शारंगधर संहिता*
*अर्थ -
जब दो प्रणालियाँ एक ही लय या फ्रीक्वेंसी पर स्पंदित होती हैं।*
*उदाहरण -
एक शांत और प्रसन्न वैद्य के स्पर्श मात्र से घबराया हुआ रोगी शांत हो जाता है।*
*चिकित्सीय उपयोग-
यह नाड़ी परीक्षा और मंत्र/ध्वनि चिकित्सा का आधार है। नाड़ी की तरंगों से वैद्य रोगी के त्रिदोष की लय (vibration) को समझता है।*
*11- पूर्ण संतुलन- perfect balance*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - धातुसाम्य*
*मूल संदर्भ -
कार्यं धातुसाम्यम्, तस्य लक्षणं विकारोपशमः
चरक संहिता*
*अर्थ -
विभिन्न विपरीत शक्तियों का आपस में संतुलित रहना।*
*उदाहरण -
शरीर में पित्त और कफ का सही अनुपात में बने रहना।*
*चिकित्सीय उपयोग-
धातुसाम्य क्रिया चोक्ता तंत्रस्यास्य प्रयोजनम् -
आयुर्वेद का एकमात्र उद्देश्य शरीर में धातुओं की साम्यता है।*
*12- सामंजस्य स्थापित करने वाला - harmonizing*
*संस्कृत/शास्त्री नाम - ऋतु-सात्म्य / लोकोपकल्पना*
*मूल संदर्भ -
तस्याशिताद्यादाहाराद्बलं वर्णश्च वर्धते। यस्यर्तुसात्म्यं विदितम्...
अर्थ - अंदर की दुनिया और बाहर के पर्यावरण के बीच तालमेल बनाना।*
*उदाहरण -
सर्दी के मौसम में शरीर का काँपकर ऊष्मा पैदा करना और गर्मी में पसीना बहाकर शरीर को ठंडा रखना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
ऋतुचर्या और दिनचर्या का पालन इसी सामंजस्य को बनाए रखने के लिए कराया जाता है।*
*C- पोषण, विकास एवं शोधन-
(nourishing, immunity & detox)*
*13- प्रगतिशील/ विकासशील- evolutionary / progressive*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - सत्व वृद्धि / ओजोवर्धन*
*मूल संदर्भ -
उत्कृष्टं सत्त्वम्/ वर्धनं आयुषः -
अर्थ -
हमेशा उच्च स्वास्थ्य और चेतना के स्तर की ओर बढ़ना।*
*उदाहरण -
एक छोटे बच्चे की शारीरिक और मानसिक वृद्धि का निरंतर आगे बढ़ना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
ओजस वर्धन और सत्व गुण का विकास। रोग केवल एक अवरोध है, शरीर का मूल स्वभाव आगे बढ़ना और स्वस्थ रहना है।*
*14- पोषण देने वाला - nourishing*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - स्नेहन / तर्पण / बृंहण*
*मूल संदर्भ -
प्रजीवनं तर्पणं च स्नेहनं धारणं तथा*
*अर्थ -
जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक रस और ऊर्जा प्रदान करना।*
*उदाहरण -
माँ का दूध नवजात शिशु को हर प्रकार की सुरक्षा और पोषण देता है।*
*चिकित्सीय उपयोग -
यह कफ दोष का सौम्य गुण और धातु-पोषण न्याय (जैसे क्षीर-दधि न्याय) है। बृंहण चिकित्सा इसी गुण पर आधारित है।*
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*15- एकीकरण करने वाला - integrating*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - आयु / संचय-संघात*
*मूल संदर्भ -
शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारी जीवितम् ..
चरक संहिता*
*अर्थ -
अलग-अलग घटकों को जोड़कर एक संपूर्ण इकाई बना देना।*
*उदाहरण -
ईंट, सीमेंट और लोहे को मिलाकर एक सुदृढ़ संरचना बनाना।*
*चिकित्सीय उपयोग-
चरक के अनुसार शरीर, इंद्रिय, मन और आत्मा का जुड़ना ही 'आयु' है । इन चारों को एकीकृत रखना ही जीवन है।*
*16- स्मृतिधारण/जैविक स्मृति- epigenetic memory / memory retention)*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - कोशिकीय स्मृति / संस्कार-स्मृति*
*मूल संदर्भ -
स्मृतिश्च प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् / "जातिस्मरत्वम्"*
*अर्थ-
Cellular level पर सूचनाओं और अनुभवों को याद रखना।*
*उदाहरण-
इम्यून सिस्टम जब एक बार Smallpox के वायरस को हरा देता है तो उसकी एंटीबॉडीज जीवनभर याद रखती हैं।*
*चिकित्सीय उपयोग -
यह 'स्मृति' की Cellular form है। प्रज्ञापराध मिटाने और कुलज विकारों (genetic diseases) की सम्प्राप्ति विघटन में इसका प्रयोग होता है।*
*17- शुद्ध करने वाला - purifying*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - शोधन / मलनिर्सरन*
*मूल संदर्भ -
मलापकर्षणं शोधनम् ….
अष्टांग हृदय*
*अर्थ -
त्याज्य और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालकर स्वयं को स्वच्छ करना।*
*उदाहरण -
छर्दि या अतिसार,रेचन के माध्यम से दूषित भोजन को शरीर द्वारा स्वतः बाहर फेंक देना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
शोधन चिकित्सा (पंचकर्म)—वमन, विरेचन, वस्ति आदि का कार्य शरीर की इसी अंतर्निहित शुद्धिकरण क्षमता को गति देना है।*
*18- स्वाभाविक पुनर्प्राप्ति क्षमता- homeostatic resilience / homeostasis*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम- स्वाभावोपरम*
*मूल संदर्भ -
जायन्ते हेतुवैषम्याद्विषमा देहधातवः। हेतुसाम्यात् समास्तेषां स्वभावोपरमः सदा*
*अर्थ -
रोग या आघात के बाद स्वतः ही अपनी पुरानी सामान्य स्थिति में लौट आना।*
*उदाहरण -
ज्वर मुक्ति के बाद शरीर का धीरे-धीरे स्वयं अपने सामान्य बल को प्राप्त कर लेना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
चरक का 'स्वभावोपरमवाद' सिद्धांत। रोग के कारण हटते ही शरीर स्वतः स्वास्थ्य की ओर लौटता है।*
*अतिसार / ज्वर (fever / acute diarrhea) का उदाहरण लेते हैं, जब शरीर में कोई बाहरी विष (pathogen/toxin) प्रवेश करता है तो शरीर स्वयं तापमान बढ़ाकर (ज्वर) या मल के माध्यम से विष बाहर निकालकर (अतिसार) स्वयं को ठीक करने का प्रयास करता है।*
*वैद्य का कार्य केवल शरीर की इस 'स्वभावोपरम' (homeostasis) क्षमता में बाधा न डालते हुए उसका सहयोग करना है जैसे ज्वर की आरंभिक अवस्था में लंघन देना ।*
*D- अमरता, कायाकल्प एवं कालिक नियम -
(rejuvenation & chronobiology)*
*19- अमरता - immortality*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - रसायन / अमृतत्व*
*मूल संदर्भ -
लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ….
चरक संहिता*
*अर्थ -
जीवन की निरंतरता को बनाए रखना और वृद्धावस्था को रोकना।*
*उदाहरण -
एक कोशिका का विभाजित होकर नई जीवित कोशिकाओं को जन्म देना (cellular lineage)।*
*चिकित्सीय उपयोग -
यह रसायन तंत्र (rejuvenation therapy) का आधार है जो असमय वृद्धावस्था और क्षय को रोकता है।*
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*20- जैविक लयबद्धता - rhythmicity / biological chronobiology*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - काल-स्वभाव / क्रियाकाल*
*मूल संदर्भ -
कालश्च भेषजप्रयोगहेतुः…
सुश्रुत संहिता*
*अर्थ -
समय और चक्रों के अनुसार शरीर की जैविक गतिविधियों का चलना।*
*उदाहरण -
रात होते ही नींद का आना (melatonin निकलना) और सुबह पेट साफ होने की इच्छा होना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
दोषों का समय के अनुसार प्रकोप। दशविध औषध काल (दवा देने का सही समय) इसी लयबद्धता पर निर्भर करता है।*
*21- अजेयता - invincibility*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - व्याधिक्षमत्व / अजेय-ओजस*
*मूल संदर्भ -
व्याधिक्षमत्वं नाम व्याधिबलविरोधित्वं व्याधुत्पादप्रतिबंधकत्वम्*
*अर्थ -
बाहरी रोगों या कीटाणुओं के प्रभाव से अप्रभावित रहना।*
*उदाहरण -
जनपदोध्वंस या महामारी के समय भी कुछ लोगों का पूरी तरह स्वस्थ और असंक्रमित रहना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
यह व्याधिक्षमत्व (immunity) या ओजस की पराकाष्ठा है।*
*E- मानसिक, आध्यात्मिक और सूक्ष्म चेतना -
(mind & spatial mechanics)*
*22- शुद्ध ज्ञान pure knowledge*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - ऋतंभरा प्रज्ञा / सत्व-प्रकाश*
*मूल संदर्भ-
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा….
पातंजल योग सूत्र*
*अर्थ-
बिना किसी भ्रम या अज्ञान के सत्य को जानना।*
*उदाहरण -
यह पहचानना कि कौन सा भोजन मेरे शरीर के अनुकूल है और कौन सा अपथ्य या हानिकारक !*
*चिकित्सीय उपयोग -
ऋतंभरा प्रज्ञा या सत्व गुण की वृद्धि। जब रोगी में यह ज्ञान जागता है, तो वह पथ्य-अपथ्य का सही चुनाव करता है।*
*23- अस्थानिकता / सूक्ष्म-व्यापकता - non-locality / entanglement*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - विभुत्व / सर्वगत-आत्मा*
*मूल संदर्भ -
विभुत्वम् आत्मानं...
वैशेषिक दर्शन/चरक*
*अर्थ -
दूरी से परे रहकर भी एक-दूसरे को प्रभावित करना।*
*उदाहरण -
माँ का दूर रहते हुए भी अपने बच्चे के कष्ट को महसूस कर लेना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
दैवव्यपाश्रय चिकित्सा (प्रार्थना, मन्त्र, मणि धारण)। मन और चेतना भौतिक दूरी से बंधे नहीं हैं।*
*24- असीमता - unboundedness*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - असंग / स्रोतस-विमुक्तता*
*मूल संदर्भ -
सुरादीनां विसर्गः स्रोतांसि विशोधयति*
*अर्थ -
बिना किसी रुकावट के स्वतंत्र रूप से बहना।*
*उदाहरण -
एक स्वस्थ नदी का बिना किसी बाँध के समुद्र की ओर बहना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
शरीर के स्रोतस (channels) का पूरी तरह खुला होना। जब शरीर में प्राण, रक्त और रस का प्रवाह असीम होता है तो कोई शूल आदि नहीं होता।*
*हृद्रोग (cardiovascular diseases / hypertension)- जब धमनी या artery में एथेरोस्क्लेरोसिस (blockage) होता है तो 'असीमता' नष्ट हो जाती है। स्रोतोशोधन द्रव्यों जैसे अर्जुन, रसोन आदि से जब वाहिकाएं खुलती हैं तो रक्त प्रवाह पुनः असीम हो जाता है और रक्तचाप सामान्य होता है।*
*संधिवात् (osteoarthritis / joint stiffness) - संधियों में वात का संचय होने से गति की स्वतंत्रता समाप्त होती है। गुग्गुलु और प्रसारिणी तैल के प्रयोग से जब स्रोतोअवरोध दूर होता है तो संधियों में पुनः असीम गतिशीलता (unbounded movement) आती है।*
*25- स्वतंत्रता - freedom*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - निरामत्व / मोक्ष*
*मूल संदर्भ -
विगतामये न सज्जते*
*अर्थ -
बंधनों, जकड़न और विषैले तत्वों (toxins) से मुक्त होना।*
*उदाहरण:
आनाह-विबंध (constipation) या संधियों की जकड़न से राहत मिलने पर लघुता अनुभव होना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
‘साम' अवस्था से 'निराम' अवस्था की ओर जाना। आम (toxins) का पाचन होना ही असली स्वतंत्रता है।*
*26- स्व-चिकित्सा संकल्प - self-healing intention*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - सत्वावजय / संकल्प-शक्ति*
*मूल संदर्भ -
सत्वावजयः पुनरहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनोनिग्रहः….*
*अर्थ -
ठीक होने की मानसिक इच्छाशक्ति।*
*उदाहरण -
placebo effect—शक्कर या sugar की गोली को असली औषध मानकर रोगी का ठीक हो जाना केवल उसके विश्वास के कारण।*
*चिकित्सीय उपयोग -
सत्वावजय चिकित्सा (psychotherapy)। रोगी के मन में "मैं ठीक हो सकता हूँ" का संकल्प जगाना आधी चिकित्सा के बराबर है।*
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*F- शांति, वैश्विक ऊर्जा एवं परम आरोग्य -
(silence & bliss)*
*27- अनंत मौन - infinite silence*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - प्रशम / उपशम*
*मूल संदर्भ -
प्रशमाय सर्वविकाराणाम्*
*अर्थ - मन और शरीर की वह शांत अवस्था जहाँ कोई हलचल या तनाव न हो।*
*उदाहरण -
गहन निद्रा (deep sleep) या ध्यान (meditation) की अवस्था।*
*चिकित्सीय उपयोग -
इसी मौन अवस्था में शरीर cellular repair (कोशिकाओं की मरम्मत) करता है। सम्प्राप्ति का चक्र तोड़ने के लिए 'विश्राम' सबसे बड़ी औषधि है।*
*28- आत्मनिर्भरता - self sufficiency*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - स्वस्थ्य / स्व-संस्थान*
*मूल संदर्भ -
स्वे तिष्ठति इति स्वस्थः*
*अर्थ -
बाहर की किसी वैसाखी या support के बिना स्वयं को बनाए रखना।*
*उदाहरण -
एक स्वस्थ व्यक्ति को जीवन जीने के लिए रोज दवाओं की जरूरत नहीं पड़ती।
*चिकित्सीय उपयोग -
आयुर्वेद का लक्ष्य रोगी को जीवनभर दवाओं पर निर्भर बनाना नहीं, बल्कि उसके 'स्वस्थ' (अपने आप या स्वः में स्थित) होने की आत्मनिर्भरता लौटाना है।*
*29- सभी संभावनाएँ - all possibilities*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - अव्यक्त-सम्भूति / प्लुरिपोटेंसी*
*मूल संदर्भ -
एकस्मात् पिण्डाद् बहुधा भवनम्…*
*अर्थ - एक ही स्थान से किसी भी रूप में बदलने की क्षमता होना।*
*उदाहरण -
stem cells (स्टेम कोशिकाएं) जो आवश्यकता पड़ने पर हृदय, यकृत या हड्डी की कोशिका में बदल सकती हैं।*
*चिकित्सीय उपयोग -
यह कायाकल्प और tissue के पुनर्जन्म (tissue regeneration) का आधार है।*
*30- अव्यक्त - unmanifest*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - अव्यक्त / सूक्ष्म-सम्प्राप्ति*
*मूल संदर्भ -
अव्यक्तं नाम रूपेभ्यः परम्…*
*अर्थ -
जो आँखों से न दिखे परंतु सूक्ष्म रूप में उपस्थित हो।*
*उदाहरण -
दूध में छिपा हुआ घी जो दिखता नहीं पर मौजूद रहता है।*
*चिकित्सीय उपयोग -
रोग की प्रथम अवस्था—संचय और प्रकोप (षट् क्रियाकाल) जहाँ लक्षण बाहर नहीं दिखते पर सूक्ष्म असाम्यता शुरू हो चुकी होती है।*
*31- सरलता - simplicity*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - सहजता / स्वाभाविकत्व*
*मूल संदर्भ -
प्रकृतिः स्वभावः*
*अर्थ -
जीवन और प्रकृति का नियम बहुत सीधा और सहज होना।*
*उदाहरण -
भूख लगने पर खाना, प्यास पर पानी पीना, और थकान होने पर सो जाना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
स्वास्थ्य जटिल नहीं है जटिलता रोग में है। स्वास्थ्य प्रकृति के सरल नियमों को मानने में है।*
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*32- वैश्विक सह-ऊर्जा - universal synergy*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - लोक-पुरुष साम्य*
*मूल संदर्भ -
यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे...
चरक संहिता*
*अर्थ -
मनुष्य के शरीर और बाहरी प्रकृति का एक ही ऊर्जा से चलना।*
*उदाहरण -
जड़ी-बूटियाँ और मानव शरीर एक ही पाँच भूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) से बने हैं।*
*चिकित्सीय उपयोग -
इसे 'लोक-पुरुष साम्य सिद्धांत' कहते हैं। पौधे की ओषधीय शक्ति मानव देह की अग्नि और धातुओं से तुरंत तालमेल बैठा लेती है।*
*33- समत्व / समचित्तता - equanimity*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - धीरता / समचित्तत्व*
*मूल संदर्भ -
सिद्ध्यासिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते*
*अर्थ -
सुख-दुःख, लाभ-हानि में मन का स्थिर रहना।*
*उदाहरण -
मानसिक उतार चड़ाव या तनाव में भी उत्तेजित या डिप्रेस्ड अथवा अवसाद ग्रस्त न होना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
‘धीरा' अवस्था। मानसिक रोगों (उन्माद, अपस्मार, अवसाद) से बचाव का यह सबसे बड़ा कवच है।*
*इसे ऐसे भी समझते हैं तो सरल लगेगा, जब मानसिक अवसाद व चिंता (depression / anxiety / insomnia) में साधक पित्त और तर्पक कफ का सम्यग् अवस्था बिगड़ती है, तो मन में उद्वेग आता है।*
*यहां शिरोधारा, नस्य, ब्राह्मी और ध्यान (meditation) के माध्यम से मन 'समचित्तता' (equanimity) को प्राप्त करता है, जिससे कॉर्टिसोल (cortisol) का स्तर घटता है और नींद प्राकृतिक रूप से आती है।*
*34- अतीन्द्रिय अखंडता - transcendent wholeness*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - नैष्ठिकी / अखंड-संवित्*
*मूल संदर्भ -
नैष्ठिकी या विरक्तस्य...
चरक संहिता*
*अर्थ -
यह अनुभव करना कि मैं केवल एक भौतिक शरीर नहीं, बल्कि एक अखंड चेतना हूँ।*
*उदाहरण -
ध्यान के समय शरीर के भारीपन के अहसास से परे उठ जाना।*
*चिकित्सीय उपयोग -
यह 'नैष्ठिकी चिकित्सा' (spiritual healing) है जो भय, मृत्यु के डर और असाध्य रोगों के दर्द को मिटाती है।*
*35- आनंद / स्व-संतोष - bliss*
*संस्कृत/शास्त्रीय नाम - प्रसन्नता / परम-आरोग्य*
*मूल संदर्भ -
“प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते"
(सुश्रुत संहिता)*
*अर्थ -
बिना किसी बाह्य कारण के भीतर से निरंतर मिलने वाली शांति और प्रसन्नता।*
*उदाहरण -
एक पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति जब सुबह उठता है, तो बिना किसी कारण के एक सहज खुशी और ऊर्जा महसूस करता है।*
*चिकित्सीय उपयोग -
केवल रोगों का न होना स्वास्थ्य नहीं है। आत्मा, इंद्रिय और मन का आनंदित होना ही 'पूर्ण आरोग्य' (complete health) है।*
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*इस 40 वर्षीय पुरुष रोगी जिसका उल्लेख हम आरंभ से कर रहे हैं की यह नैदानिक स्थिति (clinical case) आयुर्वेद के स्थौल्य, मेदोदोष, यकृत-विकार (alcoholic /metabolic fatty liver) और आमप्रदोषज व्याधि का प्रत्यक्ष उदाहरण है।*
*एक बार फिर से रोगी विवरण जिस से यह स्मृति में रहे एवं सम्प्राप्ति घटक -*
*आयु व व्यवसाय /40 वर्ष, IT job जो बैठकर काम करने की शैली है*
*मानसिक व सामाजिक स्थिति - वैवाहिक जीवन समाप्त जिस से मानसिक तनाव, असंग, सत्त्व अवसाद।*
*शारीरिक भार 76 किग्रा (अतिस्थौल्य/मेदोवृद्धि)*
*जीवनशैली व आहार - अनियमित दिनचर्या, अकाल भोजन, प्रायः मद्यपान (अति-मद्यपान व विषमाशन)*
*प्रधान लक्षण - आलस्य, शरीर में गौरव,अंग शैथिल्य, मलत्याग के पश्चात असंतुष्टि (असाम्य मल/अविबंध), आध्मान।*
*lab report evaluation -*
*15-6-26 (प्रारम्भिक अवस्था) - sgot- 155, sgpt- 119.8, ggt- 280.2, cholesterol- 208, triglycerides- 345, vldl- 69 (गंभीर यकृत उत्तेजना, आमविष व मेदोवृद्धि)*
*20-7-26 (1 माह पश्चात) - sgot- 62, sgpt- 107, ggt- 207, cholesterol- 157, triglycerides- 273, vldl- 54.6 (यकृत-शोधन एवं चयापचय में तीव्र लाभ)*
*सम्प्राप्ति घटक -*
*हेतु -*
*आहारज हेतु - मद्यपान (अम्ल व तीक्ष्ण रस), अनियमित आहार, अति स्निग्ध व गुरु भोजन*
*विहारज हेतु- अव्यायाम (IT job वालों के पास समयाभाव रहता ही है), अनियमित दिनचर्या।*
*मानसिक हेतु - तनाव, एकाकीपन (पारिवारिक विघटन), सत्वक्षय*
*दोष -*
*कफ दोष में क्लेदक कफ (अमाशय व यकृत में अति क्लेद निर्माण), तर्पक कफ (तनाव के कारण अति प्रवृत्ति)*
*वात दोष मे समान वात (अग्नि की विषमता व आध्मान), व्यान वात (धातु संवहन व गति में अवरोध) और अपान वात (मलत्याग में असंतुष्टि)*
*पित्त दोष में पाचक पित्त (अग्निमान्द्य), रंजक पित्त (यकृत में दुष्टि, sgot/sgpt/ggt की वृद्धि)*
*धातु -*
*रस धातु (असम्य रस निर्माण, क्लेद), मेद धातु (अति संवर्धित व दुष्ट मेद), रक्त धातु (रक्तगत स्नेह/लिपिड वृद्धि)*
*मल -*
*पुरुष (मल में आम-संसर्ग, असंतोषजनक विसर्जन), स्वेद (स्रोतोरोध के कारण स्वेद का असंतुलन)*
*स्रोतस एवं दुष्टि प्रकार -*
*अन्नवह, रसवह, मेदोवह व पुरोषवह स्रोतस*
*संग (blockage/obstruction) एवं अतिप्रवृत्ति (यकृत enzymes का अत्यधिक स्राव)*
*अग्नि -*
*जठराग्नि - मंदाग्नि / विषमाग्नि*
*धात्वाग्नि -मेदाग्नि मंदता एवं रसाग्नि मंदता (जिससे आम का निरंतर निर्माण हुआ)*
*साध्यासाध्यता -*
*कष्टसाध्य (कष्ट से ठीक होने योग्य) किंतु निरंतर पथ्य, शोधन-शमन व मद्य त्याग से पूर्णतः साध्य।*
*उपशय एवं अनुपशय -*
*उपशय - दीपन-पाचन आहार, कटु-तिक्त रस, रसोन, हरीतकी, कुटकी, उष्ण जल, ध्यान (meditation)*
*अनुपशय - मद्यपान, गुरु-स्निग्ध मधुर आहार, अव्यायाम, मानसिक तनाव, दिवास्वप्न।*
*चिकित्सा सूत्र एवं औषध कार्मुकता -*
*चिकित्सा सूत्र -*
*दीपन-पाचन - स्रोतोशोधन - कफ मेदोहर चिकित्सा- यकृत-उत्तेजन व रंजक पित्त शोधन- सत्त्व अवजय चिकित्सा (मानसिक रूप से बल हेतु ध्यान)*
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*औषध द्रव्यों की पंचभौतिकता एवं कार्मुकता ….*
*रसोन -*
*पंचभौतिकता - पार्थिव व आग्नेय प्रधान (अम्ल, कटु, लवण, तिक्त, कषाय रस)*
*कार्मुकता वात-कफहर, दीपनीय, मेदोहर, तथा यकृत उत्तेजक। यह triglycerides और VLDL का क्षय करता है।*
*हरीतकी -*
*पंचभौतिकता - वायु, पृथ्वी व अग्नि प्रधान (पंचरस-लवणवर्जित)*
*कार्मुकता - अनुलोमन, स्रोतोशोधन, आम पाचन व रसायन। यह अपान वात का अनुलोमन कर मल-विसर्जन की असंतुष्टि को दूर करती है।*
*फलत्रिकादि क्वाथ -*
*पंचभौतिकता - आप्य व पार्थिव गुण शामक, अग्नि-वायु प्रधान (तिक्त-कषाय रस)*
*कार्मुकता - यकृतबल्य, पित्त रेचक व मेदोहर। यह sgot, sgpt व ggt enzymes का शमन करता है।*
*आरोग्यवर्धिनी वटी -*
*पंचभौतिकता - आग्नेय व वायव्य प्रधान (कटु-तिक्त रस, टंकण-ताम्र कटुकी युक्त)*
*कार्मुकता - दीपनीय, यकृत शोधक, मेदोनाशक व मल शुद्धिकर। यह यकृत की कोशिकाओं का पुनर्जनन या cell regeneration करती है।*
*कुटकी चूर्ण -*
*पंचभौतिकता - वायव्य व आग्नेय प्रधान (अति-तिक्त रस)*
*कार्मुकता - पित्तविरेचन, रंजक पित्त शोधन व यकृत उत्तेजक। यह ggt और cholesterol के स्तर को तीव्र गति से घटाती है।*
*ध्यान या meditation -*
*पंचभौतिकता -आकाश व चेतना प्रधान (सूक्ष्म गुण)*
*कार्मुकता - सत्त्व अवजय, मनोवह स्रोतस का शोधन, मानसिक तनाव व तर्पक कफ का शमन।*
*इन 35 गुणों में रोगी की स्थिति एवं लोक-पुरुष साम्य -*
*यह रोगी और इसकी चिकित्सा इन 35 गुणों के अंतर्गत पूर्णतः समाहित होती है। लोक-पुरुष साम्य (पिण्ड-ब्रह्माण्ड साम्य) के अनुसार रोगी की स्थिति निम्नलिखित गुणों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है…*
*गुणवत्ता संख्या 5 -
स्व संदर्भ self-referral / प्रज्ञापराध - रोगी ने मद्यपान व अनियमित आहार द्वारा प्रज्ञापराध किया जिससे उसकी कोशिकाओं की स्व पहचान (self-referral) विकृत हो गई और यकृत कोशिकाओं में वसा (fat) का संचय हुआ।*
*गुणवत्ता संख्या 7 -
पूर्ण व्यवस्था perfect orderliness / दोष-धातु-मल साम्य - रोगी के शरीर में दोष-धातु-मल समावस्था विकृत हुई (sgot, sgpt, triglycerides का बढ़ना व्यवस्था का भंग होना है)।*
[8/14, 1:26 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*गुणवत्ता संख्या 8 -
अनंत गतिशीलता infinite dynamism / वात-अवरोध - अति-मेद व क्लेद के कारण यकृत व वाहिकाओं में 'संग' हुआ जिससे व्यान व अपान वात की प्राकृतिक गति रुकी और आध्मान व असंतोषजनक मलत्याग हुआ।*
*गुणवत्ता संख्या 9 -
अनंत सृजनात्मकता infinite creativity / आग्नेय व्यापार - आरोग्यवर्धिनी, कुटकी, रसोन ने यकृत की आग्नेय क्षमता को पुनः जागृत किया जिससे दूषित मेद का पाचन होकर 1 माह में नए स्वस्थ healthy liver tissue का सृजन हुआ।*
*गुणवत्ता संख्या 11 -
पूर्ण संतुलन perfect balance / धातुसाम्य - 15-6-26 से 20-7-26 के बीच लैब मापदंडों में आया सुधार (sgot 155 से 62, triglycerides 345 से 273) शरीर के पुनः पूर्ण संतुलन की ओर लौटने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।*
*गुणवत्ता संख्या 17 -
शुद्ध करने वाला purifying / शोधन व निरामत्व - कुटकी और हरीतकी ने पित्त विरेचन और अनुलोमन द्वारा यकृत और आंतों से आमविष और अतिरिक्त लिपिड को बाहर निकालकर शोधन किया।*
*गुणवत्ता संख्या 18 -
स्वाभाविक पुनर्प्राप्ति क्षमता homeostatic resilience / स्वाभावोपरम - जैसे ही रोगी ने औषध व meditation का सहारा लिया और हानिकारक हेतुओं को घटाया शरीर का 'स्वभावोपरमवाद' गुण सक्रिय हुआ और यकृत स्वयं को ठीक करने लगा।*
*गुणवत्ता संख्या 25 -
स्वतंत्रता freedom / निरामत्व व स्रोतस विमुक्तता - स्रोतोरोध और आध्मान से मुक्ति ही स्वतंत्रता है। औषधियों ने यकृत व अन्नवह स्रोतस के बंधनों (blockages) को खोल दिया।*
*गुणवत्ता संख्या 26 -
स्व-चिकित्सा संकल्प self-healing intention / सत्वावजय - वैवाहिक जीवन समाप्त होने के कारण उपजे अवसाद को meditation ने दूर किया, जिससे रोगी के भीतर ठीक होने का संकल्प self-healing intention जागा।*
*गुणवत्ता संख्या 32 -
वैश्विक सह-ऊर्जा universal synergy / लोक-पुरुष साम्य - प्राकृत द्रव्यों रसोन, हरीतकी, कुटकी के पंचमहाभूतों ने मानव शरीर के पंचमहाभूतों से तुरंत तालमेल (synergy) स्थापित किया और यकृत के चयापचय metabolism को सुधार दिया।*
*गुणवत्ता संख्या 33 -
समत्व / समचित्तता equanimity / धीरा अवस्था - meditation के माध्यम से रोगी मानसिक द्वंद्वों व तनाव से बाहर आ गया,जिससे मनोवह स्रोतस की दुष्टि शांत हुई।*
*गुणवत्ता संख्या 35 -
आनंद / स्व-संतोष bliss / पूर्ण आरोग्य - जब आलस्य, गौरव और आध्मान समाप्त हुआ तो रोगी में शारीरिक लाघव और मन की प्रसन्नता लौटी जो पूर्ण आरोग्य की ओर पहला कदम है।*
*…… to be continue*
[8/14, 5:12 AM] Vaidya Sanjay P. Chhajed:
Understanding Panchamahabhuta in 35 qualities is a great new concept. It will help every clinician if he is able to follow it.
Great going sir, you are leading on to the path & words sowed by HH Maharshiji.
Jai Gurudev !
[8/14, 7:25 AM] Dr. Ashwani Kumar Sood:
excellent 👍🏽
[8/14, 7:51 AM] Prof. Lakshmikant Dwivedi Sir:
क्या रंजक पित्त में (सीरम) बिलरुबिन, और उसे ही त्वचा में अलग नाम(मेलानिन) दे रहे हैं
(श्वित्रज्ञ)। तो तुलना करते हुए *रंजक पित्त* के भी ?(प्रतीकात्मक)आधुनिक विविध - भेदोपभेद अनुसूचित करना चाहें।
🌞🙏🏼🌞
[8/14, 8:50 AM] Vd. Divyesh Desai Surat:
शायद भ्राजकपित्त मेलेनिन से related हो सकता है, किन्तु जब सुभाषसर ने लिखा है तो कोई वजह हो सकती है, या error हो सकती है, अगर 5 पित्त को अलग न मानकर एक माने तो रंजकपित्त मतलब पित्त ही liver में से bile का उत्पादन करता है, और पित्त याने भ्राजकपित्त त्वचा में melanocyte या मेलेनिन उत्पन्न करता है, फिर भी आपके प्रश्न का राज सर से जानना पड़ेगा ।
* 🙏*
आयुर्वेद में *भ्राजक पित्त* को सीधा melanin और त्वचा के रंग से जोड़ा गया है।
### *1. भ्राजक पित्त क्या है?*
- *स्थान*: त्वचा / त्वक् - खासकर रोमकूपों में
- *कर्म*:
1. *वर्ण प्रसादन* - त्वचा को कांति, चमक और सुंदर रंग देना
2. *लेप-अभ्यंग आदि का पाचन* - बाहर से लगाए तेल, उबटन को पचाकर गुण अंदर पहुंचाना
3. *स्वेद का निर्माण* - पसीने से शरीर का तापमान नियंत्रित करना
### *2. भ्राजक पित्त और Melanin का संबंध*
आधुनिक विज्ञान का *Melanin* ≈ आयुर्वेद का *त्वचा का वर्ण*
*कैसे ?*
1. *वर्ण निर्माण*: भ्राजक पित्त ही त्वचा को गोरा, सांवला, काला रंग देता है। ये काम आज हम Melanocytes और Melanin को देते हैं।
2. *सूर्य/उष्णता से संबंध*: ज्यादा धूप लगने पर भ्राजक पित्त बढ़ता है → त्वचा सांवली/काली होती है।
वैसे ही UV से Melanocytes उत्तेजित होकर ज्यादा Melanin बनाते हैं = Tanning
3. *रोग में*:
- *भ्राजक पित्त की वृद्धि* → त्वचा पर काले चकत्ते, व्यंग
- *भ्राजक पित्त की कमी* → पांडुता, कांति हीनता, श्वेत कुष्ठ जैसी स्थिति
इसलिए कई आयुर्वेद आचार्य *Melanin को भ्राजक पित्त का आधुनिक प्रतिरूप* मानते हैं।
### *3. Liver का पाचक पित्त vs भ्राजक पित्त*
यहीं confusion होती है:
**पाचक पित्त** *
**स्थान** Liver + आमाशय त्वचा
**काम** भोजन पचाना, Bile बनाना वर्ण बनाना, त्वचा को पोषण
**Melanin से संबंध** सीधा नहीं **सीधा संबंध**
मतलब Liver से निकलने वाला Bile melanin नहीं बनाता,
लेकिन *त्वचा में रहने वाला भ्राजक पित्त* melanin/वर्ण बनाने का मुख्य कारण है।
### *सारांश*
*भ्राजकपित्त = वर्ण का नियंत्रक*
जब भ्राजक पित्त सम अवस्था में है → त्वचा में कांति और सुंदर रंग
जब विषम है → त्वचा रोग, पिग्मेंटेशन, काले-सफेद दाग
इसलिए त्वचा के रोगों में हम *भ्राजक पित्त शामक* चिकित्सा करते हैं - रक्त शोधक, पित्त शामक द्रव्य, रक्तप्रसादक, वर्ण्य द्रव्यो से अगर पित्त को 1 ही मानते है तो शंका का समाधान हो सकता है, शायद हमलोग कितने ध्यान से पढ़ते है, ये देखने के लिए भी लिखा हो......🙏🏾🙏🏾आदरणीय सुभाष सर ही इसका निराकरण करेंगे तो कुछ विशेष ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है ।
[8/14, 8:55 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*सादर नमन आचार्य जी, देर रात्रि ही समय मिल पायेगा, इस पूरी प्रक्रिया को तब स्पष्ट कर देंगे ❤️🙏*
[8/14, 11:37 AM] Vd. Divyesh Desai Surat:
Mind Blowing..
सुभाषसर ने मेरे जैसे वैद्योका आयुर्वेद के अज्ञान का शिरोविरेचन करके ज्ञानप्राप्ति का नया द्वार खोल दिया। न जाने कितने आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांतो को उजागर किया ।
[8/14, 3:12 PM] Vd. Mohan Lal Jaiswal:
ऊँ
इस तथ्यात्मक विश्लेषण में वैद्यवर जी ने अपने गहन वैदिक, दार्शनिक, संहितोक्त ज्ञान, सूक्ष्मतीक्ष्णोष्ण चिकित्सात्मक दीर्घकालीन अनुभव व आधुनिक विज्ञान के तथ्यों को संयोजित कर विशद मार्गदर्शन कर वैद्यवरों का अन्तःकरण आलोकित किया है।
आप ने कुछ समय पूर्व उद्भासित किया था कि दर्शनों का गहन अनुशीलन कर रहा हूँ तथा पञ्चमहाभूतों के चिकित्सात्मक स्वरुप पर विमर्श जारी है।
आप के सात्त्विक अनुभवात्मक ज्ञान को नमन-वन्दन।
[8/14, 6:42 PM] Dr. Namrata Ladani:
गुरुवर को प्रणाम..
अति उत्तम एवं सूक्ष्म तम सैद्धांतिक मार्गदर्शन के लिए खूब-खूब आभार💐🙏🏻
[8/14, 8:49 PM] Prof.Vd.Arun Rathi:
*गुरुवर प्रणाम*
🙏🙏🙏
*आज सुबह से 4 बार आपके व्दारा की गई पोष्ट को पढ लिया है*
*अत्यंत ही सटिक एवं तर्क संगत विश्लेषण है*
*मस्तिष्क पटल पर जमी हुई तमोभाव की परतें बहुत हद तक कम हुई है*
*Excellent Applied Aspects For Day to Day practice with "BIO PHYSICS PRINCIPLES"*
*मोक्ष और समता : Preventive Medicine & Wellness can be observed through, दिनचर्या, रात्रिचर्या, एवं ऋतुचर्या.*
*यह आयुर्वेद का मौलिक सिद्धांत है, व्याधि की सम्प्राप्ति का विधटन कर व्याधि को पुर्णतः समूल नष्ट करे, न की लाक्षणिक चिकित्सा करे*
# *मोक्ष का सही अर्थ आपने सह उदाहरण बहुत ही सरल भाषा मे स्पष्ट किया है*
# *स्वयं मे पुर्ण जाग्रता - Fully Awake Within Itself*
*"चेतना धातु अप्येकः पुरुषः संज्ञकः"*
# *स्व संदर्भ - Self Referral : प्रज्ञापराध विगच्छ. Excellent Thinking*
# *लचिलापन - अनुकूलनशीलता - Adaptability - देश, काल सात्म्य 👌🏻*
# *स्वाभाविक पुनर्प्राप्ति क्षमता - Homeostasis - स्वाभावोपरम*
# *जैविक लयबध्दता - Biological Chronobiology*
# *अजेयता - Invincibility - व्याधिक्षमत्व*
# *आत्मनिर्भरता - Self Sufficiency - स्व संस्थान - शरीर यह स्व स्वभाव से शरीर को प्राकृत करने के लिए हर पल प्रयासरत रहता है*
# *अव्यक्त - Unmanifest - सूक्ष्म सम्प्राप्ति, Body has its own Tendency to Fight against any Disorder*
*गुरुवर "पदार्थ विज्ञान" पढने की आज भी रुचि नहीं होती है, सब शिर के ऊपर से जाता है, आप बहुत ही सरल शब्दों में इन मौलिक सिद्धांतों को स्पष्टता से समझाते हो*
*तुसी Great हो सरजी*
🙏🙏🙏
🌹🌹🌹
[8/14, 9:27 PM] Vd. V. B. Pandey Basti(U. P. ):
सही आकलन सबसे महत्वपूर्ण बात है वैद्य को बस अग्नि का नियमन करना है शेष शरीर स्वयं ही ठीक कर लेता है।🙏
[8/14, 9:48 PM] Dr.Deepika:
सादर प्रणाम गुरु जी,
lipid profile के घटकों की पांचभौतिकता आपने कैसे देखी, HDL अग्नि+वायु
बहुत ही गूढ़ विषय है ।
[8/14, 10:47 PM] Dr. Pawan Madan:
Pranam Guru Ji
Tribhutva ko Non locality se kahne ka avashya hi aapka kuch visheh abhipraaya hai, jo main samajh nahi paya.
35 clinical tatva... Isko aur detail me samajhana hai.
[8/14, 11:18 PM] Dr. Pawan Madan:
Excellent Guru ji
Hepatocyte stress
👇🏻
Increased membrane permeability
👇🏻
Leakage of sgot sgpt
Guru ji
Ranjak pitta ka kaarya Rakta ka ranjan karna bataya gyaa hai
But bilirubin is a waste product of old rbc destruction
To ham isko kis tarah aur behtar samjh sakte hain?
😌😌🙏🏻🙏🏻
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
Guru ji !
Comparison and equivalence of Chetna or Energy with Neuro physiologic line is quite tricky🤔🤔
Guru ji !
ये तीनों स्तरों पर एक ही समय में काम करता है
ये आप किस तत्त्व के बारे में कह रहे हैं ?
Is मैसेज me A point ke अंतर्गत किन नियमों का वर्णन है? याने ये क्या इंगित कर रहे हैं ?
[8/15, 1:00 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*दिव्येश भाई, अगर मैं कहूं कि रंजक पित्त आमाशय में होता है तो आपको लगेगा कि नहीं ! पर यह वहां भी होता है और वाग्भट्ट ने माना है … इस पूरे प्रकरण को जैसा हम समझते है…*
*अष्टांग हृदय सूत्रस्थान अध्याय 12/10 के अनुसार
'आमाशयाश्रयं पित्तं रंजनाद्रसरंजनात्। रंजकभ्रूमदामान्यात्...'
में वाग्भट ने स्पष्ट किया है कि आमाशय में स्थित पित्त रस-धातु को रंजित करता है।*
*अन्य प्रमाण में सर्वांग सुंदर व्याख्या देखिये,
‘सर्वाङ्गसुन्दरा:-यत्त्वामाशयस्थं पित्तं तद्रसाख्यधातो रञ्जनात्रागनिष्पादनात्, रञ्जकमुच्यते’*
*आयुर्वेद रसायन टीका- आयुर्वेदरसायनम् - रञ्जकस्याह-आमाशयाश्रयमिति । रञ्चकत्यामाशयः स्थानम्। रसरञ्जनं कर्म।*
*आधुनिक शरीरक्रिया विज्ञान में आमाशयगत रंजक पित्त का प्राथमिक कार्य castle's intrinsic factor - cif और एचसीएल hcl का स्रवण है जो भोजन से विटामिन बी12 और लोह iron का अवशोषण कराकर आरबीसी rbc/ हीमोग्लोबिन निर्माण का आधार रखता है।*
*सुश्रुत संहिता सूत्रस्थान अध्याय 21/10 के अनुसार
'यत्तु यकृत्प्लीह्नोः पित्तं तस्मिन् रंजकोग्निरिति संज्ञा, स रसस्य रागकृदुक्तः'
में सुश्रुत ने यकृत और प्लीहा को रंजक पित्त का मुख्य स्थान माना है।*
*यकृत और प्लीहा में स्थित यही रंजक पित्त आधुनिक विज्ञान में erythropoietin, ferritin/iron stores तथा heme synthesis enzymes का प्रतिनिधित्व करता है जो rbc का निर्माण कराते हैं।*
*प्राकृत रंजक पित्त की क्रिया से निर्मित hemoglobin ही इसका धारणात्मक रूप है जो रस-धातु को रंजित करके शरीर में 'रक्त धातु' की स्थिरता व पोषण बनाए रखता है।*
*जब rbc का विघटन होता है तो इसी हीमोग्लोबिन के टूटने से serum bilirubin - unconjugated & conjugatedबनता है जो आयुर्वेद की दृष्टि से रंजक पित्त का पित्त-मल' है।*
*सुश्रुत संहिता की न्याय चन्द्रिका व्याख्या, सु नि 5/3 -
‘तेन रसो रक्तं मांसमम्बु च दुष्टमनुगृह्यते। तदुक्तं चरके- “वातादयस्त्रयो दुष्टास्त्वग्रक्तं मांसमम्बु च। दूषयन्ति स कुष्ठानां सप्तको द्रव्यसङ्ग्रहः।
तथा
“रक्तं लसीका त्वङ्मांसं दूष्यं दोषास्त्रयो मलाः। विसर्पाणां समुत्पत्तौ विज्ञेयाः सप्त धातवः”
(च. चि. 7) में वर्णित है कि श्वित्र रोग में भ्राजक पित्त और रक्त धातु/रंजक पित्त की दुष्टि होती है जहाँ त्वचा में उपस्थित टायरोसिनेज एंजाइम tyrosinase enzyme भ्राजक-रंजक पित्त के आग्नेय अंश का प्रतिनिधित्व करते हुए मेलानिन melanin का निर्माण करता है। रक्त धातु और रंजक पित्त का सीधा संबंध है क्योंकि यकृत-प्लीहा में स्थित रंजक पित्त ही रक्त का निर्माण और रंजन करता है। जब शरीर में आंतरिक रूप से रक्त धातु दूषित होती है तो वह त्वचा को पोषण देना बंद कर देती है, जिससे बाह्य रूप से भ्राजक पित्त का क्षय हो जाता है*
*अतः सीरम बिलरुबिन रंजक पित्त के विघटन से बना metabolic waste product of रंजक पित्त है, जबकि मेलानिन भ्राजक और रंजक पित्त की अन्तःक्रिया द्वारा त्वचा में निर्मित dermal chromophore या pigment है।*
[8/15, 1:05 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*वैद्यवर पवन भाई, सभी प्रश्नों के उत्तर समय मिलते ही दे देंगे… क्योंकि लेखन कार्य फोन में स्वयं ही करता हूं इसलिये कुछ समय आवश्यक हो जाता है।* ❤️🙏
[8/15, 1:08 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*कृपया प्रश्न एक बार स्पष्ट लिख दीजिये।*
[8/15, 1:59 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*पवन भाई मेरा क्षेत्र तो शास्त्रोक्त चिकित्सा का है पर प्रसंगवश एवं चरक सिद्धि स्थान में लिखित तन्त्र युक्तियों के कारण पराधिकार क्षेत्र में आना पड़ता है और आधुनिक मत को अपनी सुविधा और बुद्धिबल अनुसार प्रयोग करता हूं। मेरे मत के अनुसार मैने इसे इस प्रकार समझा है….*
*hepatocyte stress के कारण cell की membrane की permeability बढ़ जाती है जिससे sgot और sgpt जैसे enzymes रक्त में लीक leak होने लगते हैं।*
*अष्टांग हृदय सूत्रस्थान अध्याय 12/10 तथा सुश्रुत संहिता सूत्रस्थान अध्याय 21/10 के अनुसार रंजक पित्त का प्राथमिक कार्य आहार रस से रक्त धातु का निर्माण व रंजन या hemoglobin synthesis करना है।*
*आयुर्वेद के प्रसाद-किट्ट सिद्धांत के अनुसार धात्वाग्नि एवं भूताग्नि पाचन के दो परिणाम होते हैं - प्रसाद भाग nutritive portion और किट्ट या मल भाग waste portion*
*रंजक पित्त का प्रसाद भाग प्राकृत हीमोग्लोबिन है जो iron व प्रोटीन के संयोग से रक्त को रक्त वर्ण प्रदान करके शरीर का धारण करता है।*
*रंजक पित्त का किट्ट या मल भाग सीरम serum bilirubin है जो पुरानी rbc destruction या heme breakdown के प्राकृतिक क्षय के बाद यकृत द्वारा निर्मित अपशिष्ट metabolic waste product है।*
*चरक संहिता सूत्रस्थान अध्याय 15 के अनुसार पित्त स्वयं रक्त का मल भी है, अतः rbc के चक्र में बिलरुबिन रंजक पित्त का excretory state है।*
*जब यकृत cells पर hepatocyte stress आता है तो यकृत में रंजक पित्त का तीक्ष्ण व उष्ण गुण अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे cell डैमेज होते हैं।*
*चरक संहिता चिकित्सा स्थान अध्याय 16/34 - 38 पाण्डु रोग पर है इसकी चक्रपाणी टीका के अनुसार प्रकुपित पित्त जब स्वयं रक्त व मांस धातु को दग्ध या hemolysis/destruction करने लगता है तब सीरम बिलरुबिन पित्त-मल की अत्यधिक वृद्धि होकर कामला रोग उत्पन्न होता है।*
*कुल मिला कर देखें तो रंजक पित्त केवल रक्त का निर्माण ही नहीं करता बल्कि निर्मित रक्त के प्राकृतिक क्षय चक्र और उसके अपशिष्ट बिलरुबिन के निष्कासन metabolic clearance का भी संचालन करता है।*
[8/15, 2:22 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*पवन भाई, आपकी जिज्ञासा अपनी जगह उचित है पर ध्यान से और सूक्ष्मता में जा कर देखें तो चेतना और neuro-physiology में तुलना और समानता कोई विरोधाभास नहीं बल्कि एक ही सत्य के दो रूप हैं - एक अनुभव है और दूसरा उसका माध्यम ।*
*चेतना और न्यूरो फिजियोलॉजी का संबंध देखिये…*
*चेतना या consciousness एक बिजली की तरह है और न्यूरो-फिजियोलॉजी nervous system उस बिजली से चलने वाले bulb & circuit की तरह है।*
*neurons, neurotransmitters और brain waves चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम हैं पर स्वयं चेतना नहीं।*
*लोकपुरुष साम्य व चेतना विज्ञान को देखें तो ….*
*चेतना या pure consciousness / energy असीम और निराकार है।*
*जब यह चेतना न्यूरो-फिजियोलॉजी में उतरती है तो यह वात, पित्त और कफ के माध्यम से शारीरिक क्रियाओं को संचालित करती है। जैसे साधक पित्त और तर्पक कफ न्यूरोट्रांसमीटर जैसे dopamine, serotonin और न्यूरल पाथवेज neural pathways की तरह कार्य करते हैं।*
*आधुनिक विज्ञान व आयुर्वेद का scientific equivalence करना वैसे तो उचित नहीं क्योंकि दोनों के अपने सिद्धान्त पर करना भी चाहें तो…..*
*quantum physics भी मानती है कि पदार्थ या matter का अंतिम सत्य energy ही है।*
*जब मस्तिष्क में meditation की स्थिति बनती है तो न्यूरो-फिजियोलॉजी में alpha/theta waves बढ़ती हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि न्यूरोलॉजिकल बदलाव चेतना के प्रभाव से ही उत्पन्न होते हैं।*
*साधारण भाषा में या हम अपनी देसी भाषा में समझें तो न्यूरो-फिजियोलॉजी चेतना का केवल hardware है और चेतना उसका software & driver है।*
*न्यूरो-फिजियोलॉजी का अध्ययन करके हम चेतना के पदचिह्नों को मापते हैं पर चेतना स्वयं उन मापों से परे संपूर्ण और स्वः प्रकाशित अथवा self luminous है।*
[8/15, 3:56 AM] Vaidya Sanjay P. Chhajed:
हम रंजक पित्त को धात्वाग्नि की तरह भी समझ सकते है गुरुदेव. रसरंजनात के मायने मे हम रस धातू मात्र को न लेकर पोषण के आद्य धातू आहार रस या चरक सूत्रस्थान अध्याय 30 मे जिसका जिक्र करता है उस ह्रदय से निस्सरीत धमनियो के माध्यम से प्रसारित रसौज नामक अपर ओज को परावर्तित करनेवाले अग्निस्त्रोत को भी ले सकते है.
[8/15, 5:50 AM] Vd. Divyesh Desai Surat:
🙏🏾🙏🏾प्रणाम गुरुश्रेष्ठ🙏🏾🙏🏾
रक्त का मल पित्त,
वाग्भट्ट जी के अनुसार रंजक पित्त का स्थान आमाशय,
एवं प्राकृत पित्त का स्थान रुधिर,
नाभि: *आमाशय*
*स्वेद:*
लसिका *रुधिरं* *रस:*
दृक *स्पर्शन* च पितस्य नाभिरत्र विशेषतः।
ओर रक्तवह स्त्रोत्स का मूल यकृत/प्लीहा
और प्राकृत पित्त का कार्य *राग*
आपके उत्तर से
धातुरूप पित्त,
दोष रूप पित्त
मल रूप पित्त
और पित्त के कार्य,
पित्त की फिजियोलॉजी, विकृत पित्त की पैथोलॉजी सभी का समाधान हो गया🙏🏾🙏🏾
और आगे आपने पित्त के कार्य पर detail में लिखा था तो धीरे धीरे
5 पित्त के प्रकार और शरीर की स्थिति को धारण करनेवाला पित्त .... आप द्वैतवाद से अद्वैतवाद की और लेकर आये
शिवोSहम के बदले
पित्तो$हम !!!
कोटि कोटि प्रणाम🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾
[8/15, 9:44 AM] Dr. Pawan Madan: प्रणाम गुरुवर 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🌹
Homeostasis 👌🏽👌🏽
स्व संदर्भ
Excellent sir
धी धृति विभ्रंश,,, बहुत ही उत्तम सूत्र
एक शंका आई गुरु जी
प्रज्ञा अपराध ,,,, क्या गलती से हुआ भी प्रज्ञापराध कहा जाएगा ?
Perfect orderliness is wonderful।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
[8/15, 9:46 AM] Dr. Shekhar Singh Rathore Jabalpur:
धी धृति स्मृति विभ्रंश से ही तो गलती होती है पवन सर...
[8/15, 9:47 AM] Dr. Pawan Madan:
बिल्कुल सही कहा आपने
पर ये धी धृति स्मृति विभ्रम क्या जीव या मनुष्य की गलती से ही होता है ?
पर ये प्रश्न तो रहेगा
एक 1 वर्ष के बालक में autoimmune process हो गई, उसमें धी धृति विभ्रंश क्यों हो गया?
गुरु जी !
स्मृति धारण को थोड़ा और समझने व प्रैक्टिस में लाना है ? कृपया मार्गदर्शन कीजियेगा, जब भी आपको समय मिले।🙏🏻🙏🏻
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
[8/15, 9:57 AM] Dr. Pawan Madan:
बायोलॉजिकल chronology is the most important rule to be followed in today's time।
Sva chikitsa sankalp works wonderfully in daily practice
Thank you very much Guru ji
🙏🏻🙏🏻
[8/15, 10:00 AM] Dr. Pawan Madan:
गुरु जी
ये 35 तत्व या सिद्धांत क्या पांचभौतिक चिकित्सा में बताए गए 35 सूत्र हैं ?
शायद हम जाने अनजाने इन 35 सूत्रों में से किसी न किसी सूत्र का प्रयोग अपनी दैनिक चिकित्सा में कर जाते है, चाहे इनका हमें पता भी न लगे
क्या ये बात सही है ?
[8/15, 10:08 AM] Dr. Pawan Madan:
Excellent Divyesh bhaai
पित्त तो गुणत: कुछ गुणों का समूह है
ऐसा कोई भी द्रव्य जो इन गुणों को परिलक्षित करते हुए पित्त के कार्यों को संपादित कर पाएगा, उसको पित्त कहा जाएगा
Melanin bhi pitta ho sakta hai
Par bhraajak pitta kewal melanin hai , ऐसा कहना शायद उचित न होगा
जैसे हार्मोंस एक ग्रुप ऑफ केमिकल्स है
उसमें से कुछ बात की तरह तो कुछ पित्त की तरह कार्य परिलक्षित करते हैं।
[8/15, 10:13 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*सुप्रभात वैद्यवर पवन भाई 🌹🙏 प्रज्ञापराध की मूल परिभाषा ले कर विषय को पूरा ही समझते हैं जिस से अन्य सदस्य जो इच्छुक हों इस विषय को जान लें,
'धीधृतिस्मृतिविभ्रंशः कर्म यत् कुरुतेऽशुभम्। प्रजापराधं तं विद्यात्...’
च शा 1/102
इसके अनुसार जब धी बुद्धि/intellect, धृति या धैर्य व नियंत्रण/control और स्मृति memory का विभ्रंश सरलता के लिये भ्रम/corruption होता है तब व्यक्ति अहितकर कार्य करता है। इसी को प्रज्ञापराध कहते हैं।*
*यहां एक जिज्ञासा होगी है क्योंकि हम सभी साधारण मनुष्य है और प्रज्ञापराध करते ही हैं कि क्या गलती से हुआ कार्य भी प्रज्ञापराध है ????*
*सूक्ष्म स्तर पर जा कर देखें तो गलती से हुआ कार्य भी प्रज्ञापराध की श्रेणी में ही आता है परंतु उसके पीछे का कारण अलग होता है।*
*जानबूझकर किया गया प्रज्ञापराध, इसमें 'धी' या knowledge तो सही होती है पर धृति अथवा self control टूट जाती है। जैसे यह जानते हुए भी कि मद्यपान या अति मीठा हानिकारक है जिव्हा के स्वाद में आकर उसे खाना।*
*गलती या अनजाने में हुआ प्रज्ञापराध,इसमें धी right judgment या स्मृति का विभ्रंश होता है। जैसे अज्ञानतावश किसी अहितकर, विषाक्त भोजन का सेवन कर लेना या यह भूल जाना कि यह आहार मेरे शरीर के अनुकूल नहीं है। इसका उदाहरण कल रात 15 aug celebration party में एक pure vegetarian व्यक्ति ने केक खा लिया जो eggless नहीं था और बाद में हमारे सामने आ कर दुखी था।*
*यहां परिणाम का नियम law of cause and effect लागू होता है…*
*प्रकृति का नियम अज्ञानता को क्षमा नहीं करता। यदि कोई व्यक्ति अनजाने में आग को छू ले तो भी हाथ जलेगा ही।*
*ठीक उसी प्रकार चाहे प्रज्ञापराध जानबूझकर हुआ हो या गलती से वह शरीर में दोषों का प्रकोप और 'स्व-संदर्भ' self-referral/homeostasis का भंग होना निश्चित रूप से उत्पन्न करता है।*
*अब दोनों में मुख्य अंतर या clinical distinction देखते हैं क्योंकि हम तो clinician है तो हमारा देखने का दृष्टिकोण वही रहेगा। गलती से हुए प्रज्ञापराध में केवल धी या अज्ञानता का दोष होता है जिसे केवल ज्ञान और शिक्षा से तुरंत सुधारा जा सकता है। जानबूझकर किए गए प्रज्ञापराध में धृति व सत्व की दुर्बलता होती है, जिसके लिए औषध के साथ-साथ सत्वावजय चिकित्सा और ध्यान meditation की आवश्यकता होती है।*
*इस पूरे कार्य का conclusion निकालें तो गलती से हुआ कार्य प्रज्ञापराध का 'अज्ञानजन्य स्वरूप' है।*
*जैसे ही व्यक्ति को सत्य का बोध होता है और वह अपनी गलती सुधार लेता है उसकी प्रज्ञा wisdom पुनः शुद्ध हो जाती है और शरीर 'पूर्ण व्यवस्था' perfect orderliness की ओर लौटने लगता है।जो 35 गुणात्मक भावों के ही अंदर समाहित है।*
[8/15, 10:18 AM] Dr. Pawan Madan:
❤️❤️❤️
कोटि कोटि धन्यवाद गुरु जी
आपने बहुत विस्तार से समझा दिया
अब ये मेरे दिमाग में फिट हो गया
पर दूसरा प्रश्न
जो मैंने 1 साल के बच्चे के धी धृति स्मृति विभ्रंश के बारे में कहा
इसको क्या सिर पूर्व जन्मकृत कह कर या समझा कर ही मान लेना होगा ?
[8/15, 10:22 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*इसका विस्तार से उत्तर दूंगा, अभी चक्रपाणी टीका ही पढ़ रहा था।* 👍
[8/15, 10:22 AM] Dr. Pawan Madan: 🙏🏻🙏🏻
[8/15, 10:54 AM] Vd. Divyesh Desai Surat:
भ्राजकपित्त नही किन्तु 5 पित्त का अलग नाम मात्र देने से प्राकृत पित्त का कार्य मे कोई बाधा नहीं उत्पन्न होगी,
जैसे Ranjitray Desai सर ने निदान चिकित्सा हस्तामलक में
1 ही आदमी पिता, पुत्र, भाई, मामा, काका आदि रोल करके भी 1 ही होता है वैसे ही पित्त 5 कार्य करके भी मूलभूत 1 ही हमारे शरीर की स्थिति धारण करनेवाला तत्व है ।
कभी कभी तो वात, पित्त, कफ में भी differenciate करना मुश्किल होता है ।
[8/15, 10:57 AM] Dr. Pawan Madan:
एकदम सही
एकदम प्रैक्टिकली सटीक
👌🏽👌🏽👌🏽❤️
[8/15, 11:00 AM] Dr.Kaustubh badave:
आदरणीय सुभाष शर्मा सर
रसोन हरितकी के घटक द्रव्य के बारे मे बता सकते है
क्या इसमे सिर्फ रसोन और हरितकी है?
या और कोई घटक द्रव्य है
[8/15, 11:03 AM] Dr. Bhadresh Naik Gujarat:
Chintya
Vicharya
Uhya
Dhey
Salkalp
Sequence remain in normal rythym leads to contructive positive action
Any one change or lack of attention leads to pragnaparagh
[8/15, 11:04 AM] Dr. D. C. Katoch sir:
All entities in the body system are the result of different combinations & permutations of Panchamahabhoot and their properties (Guna karma) and accordingly they are manifested, classified and perform their functions.
[8/15, 11:05 AM] Dr Mansukh R Mangukiya Gujarat:
रसोनहरितकी वटी:
घटक द्रव्य-
# रसोन.
# काबुली हरितकी छिलका.
# मरिच.
# वचा.
# त्वक (कल्मी - Cinnamon Zeylanicm, श्रीलंका).
# तेजपान.
निबुरस की भावना - 3.
Indication : Atherosclerosis, CAD, CVD, Anti platelet,Vericose Veins, Auto Immune Disorders, Cholelithiasis (पित्ताशय अश्मरी), Obesity (मेदोरोग )
In short यह योग स्रोतस प्रसादनकर स्रोतों मुख विशोधन करेगा ।
[8/15, 11:08 AM] Dr. Pawan Madan:
गुरु जी
आपने त्रिभुत्व को आंग्ल भाषा में Non locality कहा है, उसी का अर्थ समझ नहीं आया
[8/15, 11:11 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*बिल्कुस सही भद्रेश जी, यह awareness ही स्व संदर्भ और निरामत्व की ओर ले जाती है।*
[8/15, 11:27 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*वैद्यवर पवन भाई,
हमारी बात हिन्दी में अधिक गूढ़ होकर समझ ना आये इसलिये technical english words कई जगह दे कर चल रहे हैं, त्रिभुत्व का शास्त्रीय अर्थ देखें तो आयुर्वेद और सांख्य/वेदांत दर्शन में आत्मा, मन या शुद्ध चेतना को विभु omnipresent / infinite कहा है।*
*विभु या त्रिभुत्व का अर्थ है, वह तत्व जो किसी एक स्थान या समय की सीमा में बंधा localized नहीं है बल्कि सर्वत्र एक साथ उपस्थित omnipresent है।*
*भौतिकी में non locality का अर्थ what is non-locality in physics ….सामान्य जीवन में हम मानते हैं कि कोई वस्तु एक समय में एक ही स्थान पर हो सकती है। इसे locality या स्थानबद्धता कहते हैं।*
*परंतु क्वांटम भौतिकी में non locality का अर्थ है दो कण या ऊर्जा तरंगे एक दूसरे से करोड़ों मील दूर होकर भी पलक झपकते ही एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं यह quantum entanglement है।*
*बीच में कोई दूरी, समय या भौतिक माध्यम न होते हुए भी एक स्थान का परिवर्तन तुरंत दूसरे स्थान पर दिखाई देता है।*
*दोनों में समानता equivalence of vibhutva & non-locality देखते हैं तो जब हमने चेतना के गुण को आंग्ल भाषा में 'non-locality' कहा तो उसका अर्थ यह था कि चेतना देश space और काल time की सीमाओं से परे unbounded है।*
*जैसे रेडियो तरंगें पूरे कमरे में 'विभु' non local रूप में फैली होती हैं पर जब हम रेडियो चालू करते हैं तो वह एक स्थान पर व्यक्त local हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार चेतना संपूर्ण ब्रह्मांड में त्रिभुत्व/विभु या non-local है और शरीर/मस्तिष्क में व्यावहारिक local रूप में प्रकट होती है।*
*इसका clinical perspective भी देखते हैं ….रोगी के शरीर में जब हम meditation का प्रयोग कराते हैं तो चेतना की यही non locality या त्रिभुत्व शांत होकर मस्तिष्क और न्यूरो फिजियोलॉजी के cell को एक साथ एक ही समय में प्रभावित करती है।*
*इसलिए विभुत्व / non-locality का अर्थ है दूरी और सीमा से परे शुद्ध चेतना का सर्वव्यापी प्रभाव।*
[8/15, 11:31 AM] Dr. Pawan Madan:
सत्य वचन गुरु जी
यही में मेरा मति भ्रम हुआ था
क्योंकि मैं भी चेतना व उसके माध्यम को अलग ही मानना चाह रहा था
चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम
धन्यवाद गुरु जी !
[8/15, 11:37 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*इसका उत्तर शास्त्रोक्त ससंदर्भ सहित देंगे जिस से यह ज्ञात होगा कि हमारे आचार्यों ने जो भी कहा है वो आज के आधुनिक युग मे पूर्ण वैज्ञानिक, प्रत्यक्ष और clinical है।*
[8/15, 11:37 AM] Prof.Vd.Arun Rathi:
*आयुर्वेदानुसार आमाशय*
*नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृताः।*
च.वि.२/ १८
*व्दय स्तन मुख एवं नाभी इन तीन बिन्दुओं को जोडकर जो त्रिकोण बनता है, इस surface anatomy के निचे आनेवाले सभी अवयव यह आयुर्वेदानुसार आमाशय कहलाते है*
*त्वचा, रस, रक्त, रंजक पित्त, भ्राजक पित्त,एवं Melanin*
*त्वचा यह रस धातु का आईना होती है*
*त्वकसारं रससारं ।*
*त्वक शब्देन् त्वकस्य रसोऽभीधीयते*
च. वि ८/ ११० पर आचार्य चक्रपाणि
*त्वचा सार / रससार*
*तत्र स्निग्धश्लक्ष्ण मृदु प्रसन्न सूक्ष्माल्पगम्भीरसुकुमारलोमा सप्रभेव च त्वक् त्वक्साराणाम्।*
*सा सारता सुख सौभाग्यैश्वर्योपभोग बुद्धि विद्यारोग्य प्रहर्षणान्यायुष्यत्वं चाचष्टे।।*
च.वि.अ. ८ / १०३.
*रक्तसार*
*कर्णाक्षिमुखजिव्हानासौष्ठ पाणिपादतलनखललाटमेहनं स्निग्धरक्तवर्ण श्रीमद्भ्राजिष्णु रक्तसाराणाम्।*
*सा सारता सुखमुद्धतां मेधां मनस्वित्वं सौकुमार्यमनतिबलमक्लेश् असहिष्णुत्वमुष्णासहिष्णुत्वं चाष्टे।।*
च.वि.अ.८ / १०४
*उपरोक्त संदर्भ यह स्पष्ट करता है की रस धातु, रक्त धातु, रंजक पित्त, भ्राजक पित्त तथा Melanin आदि का स्पष्ट संबन्ध होता है और यह आपसी सहचर से एक दुसरे का अवलंबन कर कार्य करते है*
[8/15, 11:38 AM] Dr. Pawan Madan:
Wow Guru ji
Bahut hi spasht kar diya aapane
Quantum entanglement 👌🏽👌🏽
Non lacality menas all persavive
Ab samajh me aa gya
❤️❤️❤️
[8/15, 11:41 AM] Dr. Pawan Madan:
Perfect Arun ji
100% sambandh hota hai
And also sometimes they act differently psychologically many times।
[8/15, 11:43 AM] Prof.Vd.Arun Rathi:
*Physiological Applied Aspect of दश परमात्मा लक्षण*
*शरीर की परिभाषा*
*तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चमहाभूतविकारसमुदायात्मकं समयोगवाहि।*
च.शा.अ.६/४
*इस परिभाषा मे तीन तत्वों को परिभाषित किया गया है या कह सकते है तीन मुख्य बातें या मूल सिद्धांत है*
# *(शरीरं) चेतनाधिष्ठाभूतम्।*
# *(शरीरं) पञ्चमहाभूतविकारसमुदायात्मकम्*
# *(शरीरं) समयोगवाहि।*
*इसका शाब्दिक अर्थ यह है कि जो चेतना का अधिष्ठान हो, इसके घटक पंचमहाभूत से बने हो और यह घटक समत्व की अवस्था में रहकर सहयोग से कार्य करते हो उसे शरीर कहते हैं*
*आयुर्वेद का चिकित्स्य पुरुष*
# *खादयश्चेतनाषष्ठः धातवः षुरुषः स्मृतः।*
*चेतनाधातुरप्येकः स्मृतः पुरुषसंज्ञकः।।*
च. शा. १/१६.
# *पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः।*
सु.सू.१/३०
*शरीर में दोष-धातु-मल सजीव पंचमहाभूत विकार है। जब आत्मा चली जाती है तब मृत्यु हो जाती है और शरीर में निर्जीव महाभूत रह जाते हैं। अतः मृत्यु को "पञ्चतत्वं गतः" कहकर भी समझाया गया है। शरीर के घटकों को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं - स्थूल भाव एवं सूक्ष्म भाव। स्थूल भाव में दोष-धातु-मलों का समावेश है और सूक्ष्म भाव में आत्मा- इंद्रिय मन का समावेश है। शरीर इन दोनों प्रकार के भाव का संयुक्त समवेत स्वरूप। जीवन के लक्षणों में भी दोनों प्रकार के भाव की अभिव्यक्ति होती है।*
*SIGNS OF LIFE*
*इच्छा व्देषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः।*
*बुद्धिःस्मृतिरहंकारो लिङ्गानि परमात्मनः।।*
च. शा.१/७२
*परमात्मा के उपरोक्त दस लक्षण वर्णित है। परमात्मा को निर्विकार और मात्र द्रष्टा बताया गया है । जो निर्विकार होगा वह इच्छा-व्देषादि कुछ भी नहीं करेगा। मन क्रिया-समर्थ तो है परंतु अचेतन है । अतः आत्मा मन को चेतना प्रदान करती है । उसी चेतना के साथ आत्म गुण मन में भी चले आते हैं । यह सत्व या मन पंचमहाभूत विकारों के साथ संयुक्त होकर जीवन का प्रारंभ करता है । जीवित कोष में तथा उसके समुदाय से बने शरीर में जीवन के लक्षण प्रकट होते हैं और यह लक्षण आत्मा के दस गुणों के कारण होते हैं। शरीर और मन अर्थात् स्थूल भाव और सूक्ष्म भाव (आत्मा-इन्द्रिय-मन) मिलकर जीवन के लक्षणों को अभिव्यक्त करते हैं।*
*पांच लक्षण :- इच्छा, द्वेष, सुख, दुख और प्रयत्न। यह स्थूल भाव है और शरीर घटकों की अभिव्यक्तियां है।*
*शेष पांच लक्षण :- चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति और अहंकार - सूक्ष्म घटकों की अभिव्यक्तियां है*
*जीवन के लक्षणों में जिन पांच लक्षणों को शरीर और मन की संयुक्त अभिव्यक्तियों में रूप में समझ गया है उनका जैविक स्तर पर बहुत महत्व है । किसी भी जीवित कोष की महत्तम इच्छा जिजीविषा (survival ) होती है । जीवित कोष और उसके समूह से बने शरीर की जिजीविषा की पूर्ति के लिए आवश्यक है बाहर से उसे आहार मिले जो पाचन की विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से अनुकूल बने और उसे वह आत्मसात कर सके । इसीलिए जीवन का प्रथम लक्षण इच्छा ( assimilation ) है । पाचन की प्रक्रियाओं तथा आत्मसात् करने की प्रक्रियाओं के दौरान जो अवांछित एवं अनुपयोगी बचे उसे निकालना अभीष्ट है क्योंकि यदि वह शरीर में रह जाए तो हानि पहुंचा सकता है । अतः शरीर का उसके प्रति द्वेष होता है । जैविक स्तर पर इस संदर्भ में जीवन के लक्षणों के रूप में द्वेष का अर्थ (excretion ) है । जीवन या चेतना का सबसे बड़ा सुख "एकोऽहं बहुस्याम" है अतः सुख ( growth ) जीवन का तीसरा लक्षण है । इस प्रक्रिया में बाधक या भयरूप जो भी हो वह दुख ( irritability ) है ।
"अनुकूल वेदनीयं सुखं प्रतिकूल वेदनीयं दुखं"
से भी यह भाव निकलता है। मृत्यु सर्वस्वीकृत सत्य है और शरीर का हर एक जैविक कोष अपने परंपरा को बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है। परंतु एक ही कोष या शरीर का अमरत्व संभव नहीं है करण की मृत्यु अनिवार्य है। अतः जैविक स्तर पर अपने अंशों की वंश परंपरा के रूप में बनाए रखना ही प्रयत्न (reproduction) है।*
*यह पांच लक्षण आत्मा और शरीर की संयुक्त अभिव्यक्तियां है और स्थूल भाव है। इन स्थूल भाव का शेष पांच सूक्ष्म भाव ( आत्मा - इन्द्रियां - मन ) के द्वारा क्रमशः नियंत्रण किया जाता है। सूक्ष्म भाव यह स्थूल भावों के नियन्ता और प्रणेता का कार्य करते है*
*इस प्रकार चेतन इच्छा की प्रेरक है:, धृति द्वेष की प्रेरक है:, बुद्धि सुख की प्रेरक है:, स्मृति दुःख की प्रेरक है और अहंकार प्रयत्न का प्रेरक है। स्मरणीय है की सृष्टि की उत्पत्ति भी अहंकार से मानी गई है और जैविक स्तर पर अहंकार से प्रेरित होकर प्रयत्न ही प्रजोत्पत्ति का कारण है।*
*In Short*
*इच्छा-Assimilation-चेतना*
*द्वेष-Excretion-धृति*
*सुख-Growth-बुद्धि*
*दुःख-Irritability-स्मृति*
*प्रयत्न-Reproduction-अहंकार*
*Important note: जीवन को ज्ञापित करने वाले कुछ कर्म भी शास्त्रों में वर्णित है यथा श्वोसोच्छ्वास, उन्मेष-निमेष, चेष्टा, प्रीणन, धारण आदि, इनका भी शरीर के स्थूल भाव में समावेश होता है।*
[8/15, 11:49 AM] Vd. Divyesh Desai Surat:
🙏🏾🙏🏾जी आदरणीय कटोच सर, अलग अलग भी है, और 1 भी है,
द्वैत से अद्वैत की ओर
सभीके अपने अपने गुण, कर्म से अलग भी है, और सभी 1 ही शरीर मे रहने से 1 भी है ।🙏🏾🙏🏾
[8/15, 11:55 AM] Prof. Lakshmikant Dwivedi Sir:
ते व्यापिनोऽपि गौण मान लिया क्या? 🇮🇳🙏🏼🇮🇳
[8/15, 12:01 PM] Dr. D. C. Katoch sir:
Yes, panchabhoutik hone matre se sab ek hain aur bhoot- dosh- gun karm ke utkarsh ke anusaar bhinn bhinn hain.
[8/15, 12:01 PM] Dr. Bhadresh Naik Gujarat:
Respected vd subhassh sharmaji
Selute to u sir
Complex etiophatology of disease is a mysterious
We need to focus on all about
Car model is a unique for understanding nuero etiophatology
Please highlight your expert opinion
Ayuved basics concept
Tridosh
Atma
Man
Indriya
Panchmahabhut
Samprapti
No words to gratitude bcz sirji u r our roadmap
Indicator
Google map and direction 🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏
[8/15, 12:25 PM] Prof.Vd.Arun Rathi:
*नमस्कार वैद्यराज दिव्येश भाई*
🌹🌹🌹
[8/15, 1:30 PM] Vd. Divyesh Desai Surat:
गौण नही, व्यापिनो$पि तो सत्य है ।🙏🏾🙏🏾
जैसे अभी विष्णु भगवान निंद्राधिन है, तो संचालन शिवजी करते ही है,
सभी दोषों को सभी कार्य का ज्ञान है, जरूरत पड़ने पर वो कर लेते है...सभी मे धातु बनने का सामर्थ्य है ।
आयुर्वेद से मुक्ति, सेल्फ हीलिंग, कार्य कारण वाद....
सुभाषसर ने 35 पॉइंट्स में चारो पुरुषार्थ की प्राप्ति के बारे में बता दिया ।🙏🏾🙏🏾
[8/15, 1:57 PM] Prof. Lakshmikant Dwivedi Sir:
अंत:शाक्ता बहि:शैवा सभामध्ये च वैष्णवा ।
नाना रूप धरा .....
[8/15, 5:56 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*वैद्यवर पवन जी, इस जिज्ञासा को आचार्य चरक और चक्रपाणी के मत से संदर्भ सहित देख कर निष्कर्ष निकालते है।*
*’न कालः कारणं राजन्, राज्ञो कालः कारणं भवेत्….’अर्थात सत्य सिद्धांत काल से बंधे नहीं होते बल्कि काल सिद्धांतों से संचालित होता है।*
*हमारे ऋषियों और आचार्यों ने मनुष्य के शरीर को केवल मांस-मज्जा का पुतला नहीं माना बल्कि उसे 'चेतना' Consciousness, प्रकृति Nature और प्रज्ञा Wisdom के साथ एक पूर्ण और अखंड प्रणाली holistic system के रूप में देखा।*
*यही कारण है कि काल कितना भी बदल जाए, तकनीक कितनी भी उन्नत हो जाए, लेकिन मानव शरीर विज्ञान, चेतना और रोगों के मूल कारण से जुड़े ये सूत्र आज भी उतने ही सटीक, प्रभावी और व्यावहारिक हैं जितने सहस्रों वर्ष पूर्व थे।*
*जब हम आधुनिक विज्ञान, Genetics, Epigenetics), न्यूरो फिजियोलॉजी और क्वांटम फिजिक्स के चश्मे से चरक संहिता के इन सूत्रों को देखते हैं तो आचार्यों की दूरदृष्टि और उनका सर्वकालिक Universal प्रभाव स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आता है……*
*जीनोमिक्स और आनुवंशिकी में 'बीज-भाग-अवयव दुष्टि' चरक संहिता में च. शा. 4/30 में वर्णित 'बीज-भाग-अवयव' का सिद्धांत आधुनिक Genetics और Chromosomal Aberrations का ही संहिताबद्ध रूप है। यह दिखाता है कि हजारों वर्ष पूर्व भी आचार्यों को cellular और जीनीय स्तर पर होने वाले परिवर्तनों का सटीक ज्ञान था*
*Epigenetics में माता पिता का प्रभाव….. गर्भिणी के आहार-विहार का शिशु के डीएनए अभिव्यक्ति पर असर होना (च. शा. 4/18) आज की आधुनिक Epigenetic Science द्वारा सिद्ध हो चुका है कि माता का वातावरण और जीवनशैली बच्चे के जींस को म्यूटेट mutate या स्विच ऑन/ऑफ कर सकती है।*
*ऑटोइम्यूनिटी और स्व पर बोध ….. ऑटोइम्यून विकारों को आधुनिक चिकित्सा आज भी जटिल मानती है, जबकि आचार्यों ने इसे 'व्याधिक्षमत्व का विभ्रंश' और cellular स्तर पर 'प्रज्ञापराध' कहकर इसके मूल कारण को पकड़ा था।*
*क्वांटम भौतिकी और 'विभुत्व' ….. चेतना के 'विभुत्व' या 'Non-locality' का सिद्धांत आज आधुनिक Quantum Entanglement के सबसे उन्नत अनुसंधानों से मेल खाता है।*
*1 वर्ष के बालक में प्रज्ञापराध व ऑटोइम्यून प्रक्रिया का शास्त्रीय व वैज्ञानिक विश्लेषण हम आज के संदर्भ में ससंदर्भ अपने संहित ग्रन्थों से निकाल कर लाये हैं….*
*बालक और माता-पिता का अंतर्संबंध - आयुर्वेद में बालक को केवल एक अलग इकाई नहीं बल्कि माता-पिता का ही एक अंग extension माना है।*
*चरक संहिता के अनुसार गर्भ मातृज, पितृज, आत्मज और रसज भावों का योग है। 1 वर्ष का बालक मुख्यतः क्षीराद' दुग्ध पर निर्भर होता है। यदि माता के आहार-विहार या मानसिक स्थिति में धी-धृति-स्मृति विभ्रंश प्रज्ञापराध हुआ हो तो उसका सीधा प्रभाव 'स्तन्य' के माध्यम से बालक के धातुओं और प्रतिरक्षा प्रणाली पर पड़ता है।*
*….'मातृजश्चायं गर्भः... पितृजश्चायं गर्भः... आत्मजश्चायं गर्भः...’
चरक शा 3/3-6*
*बीज दोष व पूर्वजन्मकृत कर्म genetic & epigenetic factors …..*
*चरक संहिता में बीज-भाग-अवयव दुष्टि chromosomal/ genetic defects और पूर्वजन्मकृत कर्म (दैव) को जन्मजात विकारों का मूल कारण माना गया है।*
*गर्भाधान के समय यदि मातापिता के शुक्राणु या डिम्ब sperm & ovum के बीजांश में प्रज्ञापराध जन्य दोष संसर्ग हो तो वह शिशु के dna/genes में 'बीज भाग दुष्टि' के रूप में संक्रांत होता है।*
*बालक के स्तर पर यह कोशिकाओं का सहज विभ्रंश या inherited breakdown of self referral है न कि बालक द्वारा स्वयं किया गया जानबूझकर प्रज्ञापराध…..
'यस्य यस्य ह्यंगवयवस्य बीजे बीजभागो उपतप्तो भवति, तस्य तस्य अंगवयवस्य विकृतिरुपजायते...’
चरक शा 4/30……
'यद्यज्जातं गर्भिणी उपसेवते तत्तदंगयुक्तं अपत्यं जनयति...’
च शा 4/18*
*एक वर्ष के बालक में स्तन्य दुष्टि का प्रभाव …. एक वर्षीय बालक आहार के लिए पूर्णतः स्तन्य पर आश्रित होता है।*
*माता के प्रज्ञापराध, असाम्य आहार या मनो तनाव के कारण जब माता के दोष कुपित होकर स्तन्य को दूषित करते हैं तो उस दूध के सेवन से बालक के शरीर के स्रोतस अवरुद्ध हो जाते हैं। इससे बालक की प्रतिरक्षा प्रणाली भ्रमित होकर स्वयं के cells पर आक्रमण या autoimmune response करने लगती है।….
'धातॄणां प्रकुपिता दोषाः स्तन्यं दूषयन्ति यत्।
ततः क्षीरामया बालान्मार्गाणां संनिरोधनात्’
च चि 30/ 232-233*
*प्रज्ञापराध का मूल स्वरूप -
बुद्धि (धी), धैर्य (धृति) और स्मृति के भ्रष्ट होने पर जब कोई अहितकर या विपरित कार्य किया जाता है, तो उसे प्रज्ञापराध कहते हैं। यह शरीर के समस्त दोषों को कुपित करने वाला मुख्य कारण है।
*शिशु के मामले में यह प्रज्ञापराध उसके अपने सचेतन निर्णयों से नहीं बल्कि माता पिता से प्राप्त बीजीय संस्कार और स्तन्यज दोषों के रूप में उसके cell में self vs non-self recognition को बाधित करता है…..
'धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत् कुरुतेऽशुभम्।
प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम्’
च शा 1/102*
*अत वैद्यवर पवन भाई 1 वर्ष के बालक में हुआ autoimmune process बालक का स्वयं का किया गया कर्म या अपराध नहीं है। शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार यह मातृज-पितृज प्रज्ञापराध (च. शा. 4/18),
बीज भाग दुष्टि (च. शा. 4/30) तथा
दूषित स्तन्य पान (च. चि. 30/232) का सम्मिलित परिणाम है जिसने बालक के cell के 'self-referral को खंडित कर दिया।*
[8/15, 6:00 PM] Vd. V. B. Pandey Basti(U. P. ):
बहुत गहरी अनुभूतिक जानकारी गुरुवर।🙏
[8/15, 6:05 PM] Dr. BK Mishra:
🙏🏼🙏🏼 जय हो 💐
[8/15, 6:12 PM] Prof.Vd.Arun Rathi:
*प्रणाम गुरुवर*
🙏🙏🙏
[8/15, 6:28 PM] Dr. D. C. Katoch sir:
Very vividly analysed and presented the causation of autoimmune disease in one year old child based on classical references.
Sadhuvaad Vd Sharma Ji. As understood scientifically the autoimmune diseases originate from the erroneous genetic expression to induce subtle mismatch/ disturbance in the milieu interior (Prakrit avastha - Samyavastha of Dosh-Dhatu- Mala). The cause is endogenous or intrinsic imbalance not exogenous or extrinsic. However, lifestyle factors
(Aahar, Vihar, Aachar, Vichaar) of parents influence the Ling Sharir/Sukshma Sharir at the time of conception and expression of genetic characteristics of the feutus -child.
[8/15, 7:20 PM] Dr. Bhadresh Naik Gujarat:
Respected sirji
Now a days scientist elaborate sperm and ovum have a past memories they carry during conception
Partners disagreement
Conflict
Stress.
Anxiety
Or bad emotional hurt
Even genome carry
For that sirji u hv rightly suggest sadachar and achar rasayan need to focus.
[8/15, 7:22 PM] Vd. Divyesh Desai Surat:
🙏🏾🙏🏾
स्तन्य दुष्टि को मॉडर्न डॉक्टर ज्यादा महत्व नही देते, किन्तु जब महाराष्ट्र के गॉव से आने वाले गन्ने काटने वाला अनपढ़ मजदूर, 1 साल के बच्चों को कोई तकलीफ होती है तो, बच्चे के माता की स्तन्य बिगड़ा तो नही है न ? या फिर इसकी वजह से तो बच्चा बिमार नही है न ? तब लगता है कि ये अनपढ़ लोग पढ़े लिखे से ज्यादा बच्चे की health के लिए conscious है, या फिर उन लोगो को आयुर्वेद का ज्ञान है ।
पढ़े लिखे लोग केवल INFECTION के बारे में ही जागरूक होते है, और खुद की pregnancy के दौरान चाइनीज़ या लवण रस प्रधान आहार खाते है और जब बच्चे के बाल 7/8 साल में सफेद हो जाते है, तब खुद के प्रज्ञापराध के बारे में पता ही नही होता...।
[8/15, 7:23 PM] Dr. Bhadresh Naik Gujarat:
Genetic disorders always a complex and mysterious issues
Need to focus from preconception
Post conception
Mitochondria
Atp
O2
Na
K
Iron
Glucose
Even need to focus on cellular agni
Transportation
Conduction
Protine is a complex sirji Please guide us Protine deapth knowledge
Thanks sirji
[8/15, 7:49 PM] Prof. Giriraj Sharma:
Neurological aspects of Aatma
(Neurological functional correlation )
प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः ।
इन्द्रियान्तरसञ्चारः प्रेरणं धारणं च यत् ॥७०॥
देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा ।
दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥७१॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः ।
बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥७२॥
यस्मात् समुपलभ्यन्ते लिङ्गान्येतानि जीवतः ।
न मृतस्यात्मलिङ्गानि तस्मादाहुर्महर्षयः ॥७३॥
Neurological functions-
consciousness, sensory–motor integration और reflex physiology से correlate किया जा सकता है—
प्राणापानौ
श्वसन का automatic control — brainstem respiratory centres, medulla and pons; inspiration–expiration regulation
निमेषाद्या
Blink reflex, eyelid closure and other protective reflexes; blink trigeminal sensory input and facial motor output
जीवनम्
Integrated autonomic functions—respiration, cardiovascular regulation, arousal, brainstem and autonomic nervous system
मनसो गतिः
Mental activity / cognition, attention, thought; distributed cortical–subcortical networks
इन्द्रियान्तरसञ्चारः
Sensory information, CNS integration with many sensory modalities processing
प्रेरणम्
Motor initiation/command—motor cortex, basal ganglia, corticospinal pathways
धारणम्
Postural maintenance, motor control and physiological regulation; brainstem, cerebellum, vestibular system etc
देशान्तरगतिः
Spatial orientation, navigation and movement; vestibular–proprioceptive–cortical integration
स्वप्ने
Dreaming during sleep, REM sleep; thalamo-cortical and brainstem networks
पञ्चत्वग्रहणम्
integrated physiological functions end (brain death) like functional similarity,
दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमः
Visual perception and binocular/cross-modal integration; optic pathways and visual cortex
इच्छा
Motivation, goal-directed behaviour; limbic system, hypothalamus, prefrontal networks
द्वेषः
Aversion/threat processing; amygdala, insula, hypothalamic and cortical networks
सुखम्
Reward/pleasure processing; mesolimbic reward circuitry
दुःखम्
Pain , affective suffering; nociceptive pathways + insula/anterior cingulate cortex
प्रयत्नः
Voluntary motor effort/intention; motor cortex, basal ganglia, cerebellum
चेतना
Consciousness/awareness—ascending arousal system + thalamo-cortical networks
धृतिः
Self-control, sustained attention, behavioural inhibition; prefrontal executive networks
बुद्धिः
Discrimination, judgement, reasoning; prefrontal–parietal association networks
स्मृतिः
Memory; hippocampus, medial temporal lobe तथा distributed cortical networks
अहङ्कारः
Sense of self/self-representation; distributed default-mode, medial prefrontal, parietal and insular networks
“निमेष” को आधुनिक physiology से जोड़ते समय blink reflex सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
Blink reflex का आधुनिक neurological arc:
Cornea → Trigeminal nerve (V1) → spinal trigeminal nucleus → interneurons in brainstem → facial nucleus → Facial nerve (VII) → Orbicularis oculi → eyelid closure
अर्थात्:
उद्दीपन → sensory afferent → CNS integration → motor efferent → protective response
इसी प्रकार प्राण–अपान को respiratory rhythm से correlate करें तो:
Chemoreceptors / sensory input → medullary respiratory centres → phrenic/intercostal motor pathways → inspiration/expiration
यहाँ भी एक integrated neurological regulatory system दिखाई देता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात
चरक का यह वर्णन केवल reflex की सूची नहीं है।
क्रमश
जीवन → sensory integration → motor initiation → spatial awareness → sleep/dream → sensory perception → इच्छा/द्वेष → सुख-दुःख → प्रयत्न → चेतना → बुद्धि → स्मृति → अहंकार
तक का अत्यंत व्यापक functional description of the living person मिलता है।
इसलिए आधुनिक neuroscience में
Autonomic function + Reflexes + Sensory integration + Motor function + Consciousness + Cognition + Emotion + Memory + Self-awareness
के एक integrated framework के रूप में देखना अधिक उचित है।
[8/15, 8:54 PM] Dr. Pawan Madan:
This is interesting -- need more discussion
[8/15, 9:15 PM] Dr. Pawan Madan:
प्रणाम गुरुवर
आपने बहुत ही महत्वपूर्ण संकेतों की तरफ ध्यान दिलाया
Epigenetics को आज के संदर्भ में शास्त्रीय मतानुसार आपने बहुत बढ़िया बताया
इस की गहराई में जाने की अब आवश्यकता है
मात्रज पितृज प्रज्ञापराध
बीजभाग दृष्टि
दूषित स्तनय
ये बहुत ही महत्वपूर्ण हैं
कोशिश करूंगा के इन सिद्धान्तों के चिकित्सकीय पक्ष के साथ किसी एक केस रूप में प्रस्तुत करूं
बहुत बहुत धन्यवाद।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
[8/15, 9:15 PM] Dr. Pawan Madan:
Ji guru ji
In सब बातों/तथ्यों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।
[8/15, 9:17 PM] Dr. Pawan Madan:
Dear sir
Can you share some link of research about sperm and ovum memory?
Thanks
[8/15, 9:29 PM] Prof. Lakshmikant Dwivedi Sir:
पयोभव नवनीत तो कलांश होता है। भावना तो नींबूस्वरस की है। नवनीत का स्नेहांश विलीन होने तक पर्याप्त ,करीब " २५०ग्राम के बैच के लिए नवनीत १५.६ ग्राम स्नेहांश के विलीन करने के लिए * ९५ नींबूरस की भावना की संस्तुती की है।🙏🏼
[8/15, 10:03 PM] Vaidya Sanjay P. Chhajed:
धी विभ्रंश ही तो प्रज्ञापराध ही है.
[8/15, 10:09 PM] Vd. Divyesh Desai Surat:
आत्मा की न्यूरोलॉजिकल आस्पेक्ट से function बताने के लिए शुक्रिया🙏🏾🙏🏾 आपकी कविता भी हृदय को या आत्मा को छूने वाली होती है💐💐
आदरणीय शर्मा सर,
आपकी शरीर रचना & क्रिया शरीर पर लिखी पुस्तक कहाँ मिलेगी? आपसे 1 प्रश्न है....
क्या प्राणायतन को आत्मा के EXIT /द्वार कह सकते है ?
[8/15, 10:11 PM] Dr. Bhadresh Naik Gujarat:
Vagus nerve action
Glymphatic system
Gut syndrome corelation is key to understand respected sir logic and interpretation
[8/15, 10:12 PM] Vd. V. B. Pandey Basti(U. P. ):
सरल भाषा में अपनी ग़लती न स्वीकार करना सबसे बड़ा प्रज्ञापराध है।🙏
[8/15, 10:20 PM] Dr. Ravikant Prajapati M. D, BHU.:
हित-अहित को जानते हुए भी अहितकर कार्य करना = प्रज्ञापराध
प्रज्ञापराध के 3 मुख्य प्रकार -
*धी-विभ्रंश* — क्या हितकर और क्या अहितकर है, इसका सही ज्ञान न होना।
*धृति-विभ्रंश* — सही ज्ञान होने पर भी मन को गलत कार्य से रोक न पाना।
*स्मृति-विभ्रंश* — पहले से ज्ञात हितकर बातों को भूल जाना।
[8/15, 10:58 PM] Prof. Giriraj Sharma:
चरक का षड्भाव सिद्धान्त और आधुनिक epigenetic thinking एक तुलनात्मक अध्ययन से समझा जा सकता है
“सात्म्यज भाव” को केवल “environmental regulation” कहना बहुत संकीर्ण होगा। चरक की षड्भाव-विचारणा में यह उससे कहीं अधिक गहरा सिद्धान्त है।
चरक के अनुसार गर्भ की संरचना में छह प्रकार के भाव हैं:
मातृज → पितृज → आत्मज → सात्म्यज → रसज → सत्त्वज
यहाँ सात्म्यज भाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि “सात्म्य” का अर्थ है—जिससे शरीर/मन का अनुकूलन या सामंजस्य हो गया हो।
अर्थात् यह केवल बाहरी environment नहीं है, बल्कि:
जिस आहार, विहार, देश, काल और जीवन-परिस्थिति के साथ शरीर अनुकूलित होकर उसे सहज रूप से स्वीकार करने लगे—वह सात्म्य की दिशा है।
इसलिए epigenetics से सम्बन्ध बनता है ।
आधुनिक epigenetics कहती है कि:
DNA का sequence स्थिर रहते हुए भी
environment → cellular signalling → gene regulation → gene expression को प्रभावित कर सकता है।
चरक का सात्म्यज आदि षडभाव इससे समानता रखता है:
पर्यावरण सात्म्यज/आहार रसज/जीवनचर्या
↓
अनुकूलन (सात्म्य)
↓
शरीर की कार्यात्मक अवस्था
सात्म्यज आदि भाव = epigenetics के रूप में एक निर्देश है
चरक ने “सात्म्यज भाव” के माध्यम से यह स्वीकार किया कि मनुष्य की जैविक अभिव्यक्ति केवल मातृज-पितृज बीज से निर्धारित नहीं होती, अनुकूलित आहार-विहार रसज सात्म्यज जीवन-परिस्थितियाँ भी शरीर के विकास में योगदान करती हैं। आधुनिक epigenetics इसी molecular स्तर पर समझा जा सकता है
आचार्य चरक का मॉडल genetic determinism ही है।
विशेष रूप से यदि हम इसे षड्भाव के रूप में देखें:
चरक
आधुनिक तुलना में संभावित क्षेत्र
मातृज
Maternal contribution
पितृज
Paternal/ contribution
आत्मज
Individual progenetic/developmental factors
सात्म्यज
Adaptation to diet/environment/lifestyle
रसज
Nutrition/metabolic nourishment
सत्त्वज
Psychological/mental factors
यहाँ सात्म्यज + रसज + सत्त्वज मिलकर उस नियामक क्षेत्र को बनाते हैं जिसे आधुनिक विज्ञान में genetics से आगे जाकर gene–environment interaction, developmental biology और epigenetic regulation के विभिन्न स्तरों के समकक्ष मान सकते है
आचार्य चरक ने “बीज” को अंतिम नियन्ता नहीं माना; उन्होंने बीज के साथ सात्म्य, रस और सत्त्व को भी गर्भ और व्यक्ति के निर्माण में स्थान दिया।
एपिजेनेटिक्स इस बात का अध्ययन है कि आपके व्यवहार और आपका वातावरण आपके जीन के काम करने के तरीके को कैसे प्रभावित कर सकते हैं, बिना आपके वास्तविक DNA को बदले ।
आहार, निद्रा, ब्रह्म-आचरण जीवनशैली कारक इन जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं
आयुर्वेद में प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट प्रकृति की बात की जाती है।
आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि व्यक्तियों में आनुवंशिक, चयापचयी और जैविक भिन्नताएँ होती हैं।
“वात आदि प्रकृति = एक निश्चित epigenetic profile” से स्थापित तथ्य हो सकता है।
आयुर्वेद के आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, योग और ध्यान तथा आधुनिक epigenetic mechanisms के संबंध जरूर है ।
षड भाव, आहार निद्रा बह्म आचरण व्यायाम आदि इसके मूल कारक है ।
जिस पर पुनः चिंतन किया जा सकता है ।।
[8/15, 11:15 PM] Prof. Giriraj Sharma:
आत्मा का exit कहना उचित नहीं होगा,,,
शब्द समीक्षा अनुरूप प्राण स्थान (Shelter) माना जा सकता है ।
[8/15, 11:24 PM] Vd. Divyesh Desai Surat:
जी सर, आत्मा का 1 शरीर(काय) से निकलकर दूसरे शरीर मे जाने की प्रक्रिया या वस्त्र बदलने की क्रिया...इस अर्थ में exit, बाकी आत्मा की exit .... आत्मा की exit होकर वापस entry न हो, शायद इसे ही मुक्ति या मोक्ष कह सकते है?🙏🏾🙏🏾
[8/15, 11:25 PM] Prof. Giriraj Sharma:
प्राण और आत्मा को एक समझना उपयुक्त नहीं है प्राण आत्मा की विभिन्न यूनिट्स है,
जबकि आत्मा परम स्वरूप है ।
प्राण क्षय हो सकता है अवरोध हो सकता है मगर आत्मा में ऐसा नहीं होता ,,,
किसी एक प्राण के क्षय होने पर भी जीवन रहेगा मगर आत्मा के बिना नहीं
[8/15, 11:28 PM] Vd. Divyesh Desai Surat:
पिंड के लिये आत्मा, वो ही ब्रह्मांड के लिए
परमात्मा ?
[8/15, 11:29 PM] Prof. Giriraj Sharma:
भारतीय दर्शन में आत्मा प्रवेश और निर्गमन मनुष्य के कर्मों के अनुरूप होता है प्राय नव रंध्र ही आत्मा का प्रवेश और निर्गमन मार्ग होते है ।
[8/15, 11:54 PM] Prof. Giriraj Sharma:
धी धृति स्मृति के साथ मेधा का उल्लेख भी किया है सुश्रुत शारीर में ,,,
विमान स्थान में
चिकित्सा स्थान रसायन पाद में मेध्य रसायन बताए है
सत्त्व सार में मेधावी उल्लेख होता है
मेधा शब्द की महत्ता को समझते हुए इस विषय में चिंतन जरूरी है
धी धृति स्मृति प्रज्ञा के साथ मेधा उदारधि विश्लेषण भी जरूरी है ।
[8/15, 11:56 PM] Dr. Pawan Madan:
This glymphatic system is really very interesting
It is opening new ways
[8/16, 12:02 AM] Dr. Pawan Madan:
प्रणाम गिरिराज सर !
बहुत ही विस्तृत रूप से आपने इस आयाम को खोला
इस तरह की सोच आउट ऑफ थे बॉक्स से बहुत सी भ्रांतियां मिट जाएंगी
Shad bhaav ko dhyaan me rakhate huye hi ab se apni history taking me changes karunga
Aapka bahut bahut dhanyavaad
This guidance is going to help me a lot!
Kudos to you! 👌🏽👌🏽👌🏽👌🏽👌🏽👌🏽
[8/16, 12:57 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*सादर नमन आचार्य गिरिराज जी 🌹🙏
इस चर्चा में मुझे आपकी कमी बहुत लग रही थी कि कहीं आप व्यस्त हैं !!! यह सब आपके अधिकार का क्षेत्र है और आपके आगमन से काय सम्प्रदाय को ओज की प्राप्ति हुई है ❤️🌹🙏
च शा 1/71-73* *को इस प्रकार से आयुर्वेद के युक्ति प्रमाण से देना बेहतरीन उदाहरण है। चरक का यह श्लोक यह सिद्ध करता है कि प्राचीन महर्षियों ने मानव तंत्रिका तंत्र की सूक्ष्मतम गतिविधियों जैसे एक आँख से देखकर दूसरी आँख से उस दृश्य को पहचानना Binocular/Cross-modal integration को बिना किसी आधुनिक लैब उपकरण के, केवल गहरे प्रेक्षण Clinical Observation से समझ लिया था। यह मत न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से सही है बल्कि आयुर्वेद को आधुनिक न्यूरोसाइंस के मंच पर स्थापित करने वाला एक सशक्त दृष्टिकोण भी है।*
*आपके द्वारा वर्णित शास्त्रोक्त सारांश जीवित शरीर में दिखाई देने वाली सभी न्यूरोलॉजिकल गतिविधियां जैसे स्वतः चलने वाली श्वास और पलकों का झपकना (स्वाभाविक रिफ्लेक्स), ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों का तालमेल (सेंसरी-मोटर इंटीग्रेशन), दिशा और स्वप्न का ज्ञान (ओरिएंटेशन), राग-द्वेष व सुख-दुःख तथा बुद्धि, धृति, स्मृति व अहंकार यह सब मृत देह में अनुपस्थित रहते हैं। अतः ये सभी न्यूरोलॉजिकल व्यापार भौतिक मस्तिष्क के माध्यम से अभिव्यक्त होने वाले आत्मा और चेतना' के ही प्रत्यक्ष लक्षण हैं।*
[8/16, 1:04 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*बेहतरीन व्याख्या 👌👏*
*भद्रेश जी, इस विषय को आगे भी याद दिलायें, इसे भी शास्त्रोक्त ले कर स्पष्ट करेंगे।*
[8/16, 1:06 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*सही कहा दिव्येश भाई।*
[8/17, 8:10 AM] Shubham PGKC:
सादर प्रणाम गुरुजी !🙏🕉️🌷🙇
तत्त्वावबोधोहर्षणानां 🙏🙏
आपके द्वारा साझा किए गए इस पूरे तत्व ज्ञान को पढ़ने के बाद यह अनुभव हुआ कि आपने केवल किसी एक रोगी की चिकित्सा या 35 गुणों की व्याख्या नहीं की है, बल्कि रोग को देखने की एक सम्पूर्ण दृष्टि समझाने का प्रयास किया है।
विशेष रूप से लोक-पुरुष साम्य को केवल दार्शनिक सिद्धांत न मानकर रोगी के आहार, विहार, मानसिक अवस्था, पर्यावरण, दोष-धातु-मल, अग्नि, स्रोतस और चिकित्सा से जोड़कर देखने की दृष्टि बहुत विचारणीय, आनंददायी, ज्ञानवर्धक लगी।
इससे यह समझ आया कि केवल रिपोर्ट के बढ़े या घटे हुए मान देखकर रोगी को समझ लेना पर्याप्त नहीं है, उसके पीछे कार्य करने वाले हेतु, सम्प्राप्ति और शरीर की स्वाभाविक संतुलन स्थापित करने की क्षमता को भी समझना आवश्यक है।
35 गुणों को चेतना से लेकर शरीर की गतिशीलता, पोषण, शोधन, अनुकूलन, काल, मन, सत्त्व, समत्व और प्रसन्नता तक जिस क्रम में समझाया गया है, उससे चिकित्सा को केवल "औषधि देने" के बजाय रोगी के भीतर और बाहर के सम्पूर्ण तंत्र को समझने की प्रक्रिया के रूप में देखने की प्रेरणा मिलती है।
सबसे महत्वपूर्ण सीख मेरे लिए यह रही कि सिर्फ LFT या Lipid Profile का सामान्य होना ही स्वास्थ्य की पूर्णता नहीं है।
रोगी के लक्षण, अग्नि, आहार-विहार, मानसिक स्थिति, स्रोतस, दोष-धातु-मल की अवस्था तथा उसके जीवन में आए वास्तविक परिवर्तन को साथ में देखना आवश्यक है।
साथ ही, मेरी अत्यल्प मति/बुद्धि ने इस विषय ने मेरे मन में कई शोधात्मक प्रश्न/जिज्ञासा भी उत्पन्न किए हैं, विशेषकर 35 गुणों को clinical assessment में कैसे operationalize किया जाए, उनके लिए objective parameters कैसे निर्धारित हों और उनके आधार पर उपचार की दिशा एवं परिणाम की को कैसे सोचा जा सके।
गुरुजी, इस विषय को पढ़कर ऐसा लगा कि आयुर्वेद को समझने के लिए केवल श्लोकों का अर्थ जानना पर्याप्त नहीं है, उनके पीछे छिपे सिद्धांत को रोगी पर लागू करना और फिर उसे चिकित्सकीय अनुभव तथा शोध की कसौटी पर परखना भी उतना ही आवश्यक है।
इतने गहरे और चिंतनशील विषय को साझा करने और इस तत्व ज्ञान से रूबरू कराने के लिए हृदय से सादर आभार गुरुजी। 🙏
इससे निश्चित रूप से रोगी को देखने की मेरी दृष्टि और अधिक व्यापक हुई है।
सादर प्रणाम। 🙏
[8/17, 8:13 AM] Shubham PGKC:
आदरणीय सभी गुरुजनों,
गुरुजी, @Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi
मेरी अल्पबुद्धि से इस विषय को समझने का प्रयास करते हुए कुछ जिज्ञासाएँ आपके समक्ष प्रस्तुत हैं🙏
1) गुरुजी, यदि ध्यान के अभ्यास से cortisol में कमी आती है, तो क्या cortisol को सत्त्ववृद्धि का surrogate marker माना जा सकता है, अथवा सत्त्ववृद्धि के आकलन के लिए अन्य clinical parameters अधिक उपयुक्त होंगे?
2) गुरुजी, किसी रोगी में आम की उपस्थिति को केवल लक्षणों के आधार पर किस प्रकार सुनिश्चित किया जा सकता है ? क्या आम के लिए कोई objective clinical अथवा laboratory parameter समझे जा सकते हैं ?
3) गुरुजी, क्या किसी व्याधि के धातुगतत्व को bio-chemical markers के माध्यम से समझा या प्रमाणित किया जा सकता है ?
क्या इसके लिए किसी विशेष प्रकार के biomarkers को आधार बनाया जा सकता है ?
4) गुरुजी, क्या प्रज्ञापराध के कारण कोई अहितकर वस्तु कालांतर में व्यक्ति के लिए सात्म्य हो सकती है ?
इसमें देश, काल, प्रकृति एवं व्यक्ति-विशेष की क्या भूमिका होगी?
क्या ऐसी सात्म्यता उस वस्तु को वास्तव में हितकर बना देती है, या केवल उसके प्रति शरीर का अनुकूलन दर्शाती है?
इन विषयों को समझने की जिज्ञासा है गुरुजी।
कृपया मार्गदर्शन प्रदान करें।
सादर प्रणाम। 🙏
[8/17, 10:09 AM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*धन्यवाद डॉ शुभम त्रिपाठी जी जो आप इतनी गहराई में जा कर आयुर्वेद का अध्ययन कर के हर विषय को clinical स्तर पर समझने का प्रयास करते है।*
*मूलतः मैं एक साधारण सा वैद्य ही हूं जो private clinician है, teaching मेरा प्रोफेशन नही है इसलिये समझाने की वो शैली दे नहीं पाता। आज monday मेरे दवाखाने का अवकाश रहता है तो शास्त्रो से संदर्भ सहित आपकी जिज्ञासाओं का समाधान अवश्य करने का प्रयास करेंगे।*
*अन्य भी कोई प्रश्न हो तो निःसंकोच लिख दीजिये, एक साथ ही उत्तर लिख देंगे क्योंकि संहिता ग्रन्थ सामने ही रखें हैं…*
[8/17, 11:21 AM] Shubham PGKC:
सादर धन्यवाद गुरुजी🙏🙏
आपके ज्ञान का सदैव ऋणी🙏
[8/17, 2:03 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*प्रिय शुभम जी, आपकी जिज्ञासाओं का समाधान क्रमानुसार हमारे अल्प बुद्धि बल से इस प्रकार है…*
*1 - यदि ध्यान के अभ्यास से cortisol में कमी आती है, तो क्या cortisol को सत्त्ववृद्धि का surrogate marker माना जा सकता है, अथवा सत्त्ववृद्धि के आकलन के लिए अन्य clinical parameters अधिक उपयुक्त होंगे ?*
*उत्तर हाँ partially रूप में देखें तो neuro-endocrinology के दृष्टिकोण से कॉर्टिसोल hypothalamic-pituitary-adrenal axis के तनाव प्रतिक्रिया का मुख्य सूचक है। जब meditation, प्राणायाम और आचार रसायन से 'सत्व गुण' बढ़ता है तो मन की 'रज' और 'तम' अवस्थाएं घटती हैं। रज दोष का सीधा संबंध एड्रेनालाईन और कॉर्टिसोल के अत्यधिक स्राव से है। अतः reduction in serum cortisol और dhea/cortisol ratio में सुधार को सत्त्व वृद्धि का एक महत्वपूर्ण neuro chemical marker माना जा सकता है।*
*सत्त्व वृद्धि के आकलन के लिए अन्य clinical & lab parameters में बायोकेमिकल एवं न्यूरोट्रांसमीटर मार्कर ये बनते हैं…*
*serum serotonin & dopamine प्रसन्नता, शांति और सत्व के सूचक हैं।*
*gamma aminobutyric acid मन की समत्व और प्रशांत अवस्था का सूचक।*
*brainderived neurotrophic factor मेधा, स्मृति और न्यूरोप्लास्टिसिटी का सूचक हैं।*
*inflammatory markers जैसे CRP और il-6 में कमी क्योंकि सत्त्व गुण दाह और शोथ को घटाता है।*
*फिजियोलॉजिकल मार्कर में heart rate variability जो वात पित्त साम्यावस्था और vagal tone की वृद्धि का सबसे सटीक सूचक।*
*EEG मस्तिष्क में alpha 8-12 hz और theta 4-8 hz तरंगों का बढ़ना जो शांत-जाग्रत restful alertness सत्व अवस्था का प्रतीक है।*
*संहिता ग्रन्थों का अवलोकन करने पर आयुर्वेदिक क्लिनिकल लक्षण
‘अतश्च प्रवरमध्यावरसत्त्वाः पुरुषा भवन्ति । तत्र प्रवरसत्त्वाः सत्त्वसारास्ते सारेषूपदिष्टाः, स्वल्पशरीरा ह्यपि ते निजागन्तुनिमित्तासु महतीष्वपि पीडास्व१व्यथा दृश्यन्ते सत्त्वगुणवैशेष्यात्’
च वि 8/119*
*इस श्लोक की व्यवहारिक और प्रायोगिक व्याख्या क्योंकि हम clinician वैद्य है तो इस प्रकार समझते है…*
*सत्त्ववृद्धि एवं सत्त्वसारता के वास्तविक शास्त्रीय व क्लिनिकल मार्कर -*
*’महतीष्वपि पीडास्वव्यथा’ अर्थात अत्यधिक शारीरिक व मानसिक पीड़ा में भी व्यथित न होना, स्थिर बुद्धि emotional & physiological resilience होना।
यहां आचार्य समझाते हैं कि प्रवर सत्त्व वाले व्यक्ति का शरीर भले ही कमजोर या दुबला पतला हो, लेकिन अपनी मजबूत मानसिक शक्ति Willpower के कारण वे बड़े से बड़े रोग, शल्य क्रिया या संकट को भी हंसते-हंसते सहन कर जाते हैं।*
*आधुनिक बायोमार्कर से तुलना करें तो कम serum cortisol, उच्च heart rate variability तथा संतुलित autonomic nervous system।*
*2- किसी रोगी में आम की उपस्थिति को केवल लक्षणों के आधार पर किस प्रकार सुनिश्चित किया जा सकता है ? क्या आम के लिए कोई objective clinical अथवा laboratory parameter समझे जा सकते हैं ?*
*लक्षणों के आधार पर आम की उपस्थिति subjective clinical features अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान 13/23-24 मे इस प्रकार दिये हैं।*
*’स्रोतोरोधबलभ्रंशगौरवानिलमूढताःआलस्यापक्तिनिष्ठीवमलसङ्गारुचिक्लमाः। लिङ्गं मलानां सामानां, निरामाणां विपर्ययः’*
*अर्थात स्रोतोरोध, बलभ्रंश loss of strength, गौरव body heaviness, अनिलमूढता impaired vata movement, आलस्य lethargy, अपक्ति indigestion, निष्ठीव excessive salivation /phlegm, मलसंग constipation/ obstruction of excretions, अरुचि और क्लम unexplained fatigue।*
*आम के लिए objective clinical एवं laboratory parameters इस प्रकार बनते हैं…*
*आयुर्वेद का 'आम' un-catabolized or partially digested metabolic waste आधुनिक विज्ञान की 'chronic low-grade systemic inflammation' और 'endotoxemia' के बिल्कुल समान सा ही है।*
*high-sensitivity c-reactive protein (hs-crp) या बढ़ा हुआ hs-crp शरीर में आम systemic inflammation का सबसे सटीक प्रयोगशाला सूचक है।*
*ESR देखे तो रक्त में आप्य-पार्थिव आम की उपस्थिति से ESR बढ़ता है। आजकल दिल्ली में यहां काल का मिथ्या योग चल रहा और humidity भी बहुत है तो अधिकतर ESR बढ़ा हुआ इन दिनों में बहुत मिल रहा है।*
*serum endotoxins & lps - आन्त्र gut की मंदाग्नि के कारण आंतों के बैरियर से लीक होने वाले टॉक्सिन्स leaky gut marker।*
*lipid peroxides & oxidative stress markers -धात्वाग्नि मंदता के कारण बने फ्री रेडिकल्स।*
*tongue image analys जिव्हा पर सफेद परत की मोटाई और घनत्व का ऑब्जेक्टिव मापन।*
*urine indican test आंतों में अपक्व भोजन (आम) के सड़ने gut dysbiosisका प्रत्यक्ष मूत्र परीक्षण।*
*3- क्या किसी व्याधि के धातुगतत्व को biochemical markers के माध्यम से समझा या प्रमाणित किया जा सकता है ? क्या इसके लिए किसी विशेष प्रकार के biomarkers को आधार बनाया जा सकता है ?*
*शुभम जी इसका उत्तर हमारे अनुसार है हां बिल्कुल। जब कोई रोग केवल दोष स्तर सम्प्राप्ति की प्रारंभिक अवस्था से आगे बढ़कर धातुओं के भीतर प्रविष्ट होता है (धातुगतत्व) तो वह tissue damage markers के रूप में व्यक्त होता है।*
*विभिन्न धातुओं के धातुगतत्व हेतु बायोमार्कर्स का वर्गीकरण हम इस प्रकार कर सकते हैं…*
*रसगत व्याधि में बायोमार्कर….anemic profile, serum ferritin कमी, hypoalbuminemia, बढ़ी हुई serum osmolality।*
*रक्तगत व्याधि बायोमार्कर इस प्रकार कर सकते हैं abnormal LFT sgot, sgpt, bilirubin,elevated serum uric acid, raised CRP, abnormal peripheral blood smear*
*मांसगत व्याधि के बायोमार्कर ….. elevated serum CPK, myoglobinuria, elevated lactate dehydrogenase मांस पेशियों का क्षय या दाह का प्रतीक।*
*मेदोगत व्याधि मे बायोमार्कर ऐसेबन सकते हैं….. dyslipidemia जैसे high triglycerides, vldl, low hdl, elevated HbA1C, visceral fat percentage, serum leptin/adiponectin ratio.*
*अस्थिगत व्याधि के बायोमार्कर जैसे serum calcium, vitamin D3, parathyroid hormone (pth), dexa scan t-score,serum alkaline phosphatase.*
*मज्जागत व्याधि मे बायोमार्कर MRI, CT scan findings demyelination, B 12 deficiency, abnormal cerebrospinal fluid (csf) markers, electromyography ।*
*शुक्रगत व्याधि बायोमार्कर बनते हैं semen analysis (यcount, motility, morphology, serum testosterone, fsh, lh levels।*
*4- क्या प्रज्ञापराध के कारण कोई अहितकर वस्तु कालांतर में व्यक्ति के लिए सात्म्य हो सकती है ? इसमें देश, काल, प्रकृति एवं व्यक्ति-विशेष की क्या भूमिका होगी ?
*क्या ऐसी सात्म्यता उस वस्तु को वास्तव में हितकर बना देती है, या केवल उसके प्रति शरीर का अनुकूलन दर्शाती है ?*
*जी हां शुभम जी इसे 'ओक सात्म्य' या habituated adaptation कहा जाता है,
च सू 6/49-50 के अनुसार
‘इत्युक्तमृतुसात्म्यं यच्चेष्टाहारव्यपाश्रयम् ।
उपशेते यदौचित्यादोकः१सात्म्यं तदुच्यते,
देशानामामयानां च विपरीतगुणं गुणैः ।
सात्म्यमिच्छन्ति सात्म्यज्ञाश्चेष्टितं चाद्यमेव…’
यदि कोई व्यक्ति प्रज्ञापराधवश किसी अहितकर वस्तु जैसे धूम्रपान, मद्य, तीखा, तला भोजन या देर से सोना का निरंतर सेवन करता है तो शरीर धीरे धीरे उसका अभ्यस्त हो जाता है। इसमें देश, काल, प्रकृति एवं व्यक्ति-विशेष की भूमिका रहती है।*
*प्रकृति में कफ प्रकृति व्यक्ति अतिस्निग्ध/गुरु आहार को वात प्रकृति की तुलना में आसानी से 'सात्म्य' कर लेता है।देश में मरुदेश (शुष्क स्थान) में उष्ण/रूक्ष पदार्थ सहज सात्म्य होते हैं, जबकि आनूप देश में स्निग्ध द्रव्यों का सात्म्य कठिन होता है।*
*काल के अनुसार शीतकाल में गुरु/अम्ल आहार स्वाभाविक रूप से सात्म्य होता है जबकि ग्रीष्मकाल में वही अहितकर हो जाता है।*
*वय/सत्त्व (व्यक्तिविशेष) मे देखें तो युवावस्था और प्रवर सत्व वाले व्यक्ति में अहितकर वस्तु को सहने की क्षमता resilience अधिक होती है।*
*5- क्या यह सात्म्यता वास्तव में हितकर है या केवल शरीर का अनुकूलन adaptation ?*
*तर्क सहित समझे एवं आयुर्वेद अनुसार जो स्वस्थ शरीर की परिभाषा है यह वस्तु वास्तव में हितकर नहीं बनाती यह केवल शरीर का एक हतोत्साहित अनुकूलन toxic tolerance / physiological adaptation है।*
*आयुर्वेद के मतानुसार समझें तो अहितकर वस्तु के निरंतर सेवन से बना सात्म्य 'ओक सात्म्य' habituation कहलाता है। यह शरीर को तत्काल तीव्र लक्षण नहीं देता, परंतु सूक्ष्म रूप से 'धातु क्षय' और 'अग्निमांद्य' करता रहता है।*
*आधुनिक मत की दृष्टि से तुलना करें तो यह ठीक वैसा ही है जैसे अल्कोहल या निकोटीन का सेवन करने पर लिवर में cytochrome p450 एंजाइम्स बढ़ जाते हैं और शरीर tolerance विकसित कर लेता है। इसका अर्थ यह नहीं कि शराब या सिगरेट शरीर के लिए 'हितकर' या beneficial हो गई है, यह केवल यकृत का तनाव में किया गया अनुकूलन cellular stress adaptation है जो कालांतर में फैटी लिवर, सिरोसिस या कैंसर के रूप में प्रकट होता है।*
[8/17, 2:07 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*वैद्य को ओक सात्म्य गलत सात्म्यता को gradual withdrawal method,
‘उचितादहिताद्धीमान् क्रमशो विरमेन्नरःहितं क्रमेण सेवेत क्रमश्चात्रोपदिश्यते प्रक्षेपापचये ताभ्यां क्रमः पादांशिको भवेत्। एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं द्व्यन्तरं त्र्यन्तरं तथा क्रमेणापचिता दोषाः क्रमेणोपचिता गुणाः।
सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्प्या भवन्ति च’
च सूत्र 7/36 - 38
मेरा बहु प्रिय है, से धीरे-धीरे छुड़ाकर रोगी को पुनः 'हित-सात्म्य' ओजस और प्रकृति अनुकूल आहार की ओर लाना चाहिए।*
*अहितकर (असात्म्य) वस्तु को अचानक एक साथ छोड़ने या हितकर वस्तु को एक साथ अपनाने से शरीर में 'अग्नि वैषम्य' और 'दोष प्रकोप' होता है।*
*इसलिए अहितकर के प्रक्षेप या घटाने और हितकर के अपचय या बढ़ाने में 1/4 (25%) का क्रम अपनाया जाता है…*
*प्रथम दिन - 1/4 अहितकर कम + 1/4 हितकर बढ़ाएं*
*एकान्तर (2-3 दिन) - 1/2 अहितकर कम + 1/2 हितकर बढ़ाएं।*
*द्व्यन्तर (4-5 दिन) - 3/4 अहितकर कम + 3/4 हितकर बढ़ाएं।*
*त्र्यन्तर (6-7 दिन) - अहितकर पूर्णतः समाप्त (100%) + हितकर पूर्णतः स्थापित (100%)*
*’अपुनर्भाव एवं अप्रकम्प्यता’ चरक सूत्र 7/38 ‘क्रमेणापचिता दोषाः’ जब अहितकर अभ्यास धीरे-धीरे छूटता है तो उससे उत्पन्न दोष शरीर में दोबारा लौटकर नहीं आते (अपुनर्भाव)*
*’अप्रकम्प्या भवन्ति च: धीरे-धीरे उपचित’ ग्रहण किए गए हितकर गुण धातुओं में इतने स्थिर हो जाते हैं कि वे किसी भी विकार से डिगते नहीं (अप्रतिघात/स्थिर व्याधिक्षमत्व)।*
*down-regulation of withdrawal symptoms -
यह सिद्धांत आधुनिक न्यूरोबायोलॉजी के "tapering off protocol" और "down-regulation" के बिल्कुल समान है। किसी भी लत addiction या ओक-सात्म्य जैसे कैफीन, अल्कोहल, निकोटीन या उच्च शर्करा को जब अचानक बंद किया जाता है तो तीव्र 'withdrawal symptoms' आते हैं। पादांशिक क्रम से शरीर को re-adapt होने का समय मिलता है।*
*epigenetic shift 7 दिनों का यह क्रमिक परिवर्तन cells के metabolic enzymes और epigenetics को बिना किसी cellular stress के रिसेट कर देता है।*
[8/17, 3:02 PM] Shubham PGKC:
गुरुजी🙇🙏
मेरी जिज्ञासाओं का आपने जिस गहराई और विस्तार से समाधान किया, उसके लिए हृदय से आभार, चरण वंदन।
विशेष रूप से आपने प्रत्येक प्रश्न/विषय को आयुर्वेद के शास्त्रीय सिद्धांतों के साथ-साथ Modern science से जोड़कर जिस प्रकार समझाया, उससे विषय को देखने की मेरी दृष्टि और अधिक स्पष्ट हुई।
आपके उत्तर केवल प्रश्नों के समाधान नहीं थे, बल्कि यह समझने का अवसर थे कि शास्त्र को clinical reasoning और modern scientific understanding के साथ किस प्रकार जोड़ा जा सकता है।
आपके मार्गदर्शन से सीखने और अपनी समझ को निरंतर बेहतर करने का प्रयास करता रहूँगा।
सादर प्रणाम गुरुजी। 🙏
[8/17, 3:47 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*आपकी जिज्ञासाओं का समाधान मिला तो यह सब गुरूजनों का आशीर्वाद है जो निरंतर शास्त्रों को नियमित पठन और उन पर कार्य करने को प्रेरित करता है*🌹🙏
*मैं एक private practitioner हूं, शास्त्रोक्त चिकित्सा ही करता हूं जिसमे अगर रोगी को आधुनिक काल में लाभ जो मिला है उसे प्रत्यक्ष दिखाने के लिये modern investigations और knowledge का सहारा लेना ही पड़ेगा क्योंकि CKD रोगी में लाक्षणिक लाभ पूर्ण भी मिले पर जब तक s.creatnine और GFR में सुधार नहीं होगा, CLD मे liver fibroscan kPa की report ठीक ना हो, CAD रोगी जब 8-10 महीने बाद angiography कराये और ब्लॉकेज कम ना हो तो वो हमे fail कर देगा।*
*हमें हर हाल मे उसे लाभ देना ही है, पढ़े लिखे आधुनिक लोगों को modern ज्ञान पर आधारित संतुष्टि देनी ही पड़ेगी, तभी हम अपना जीवन यापन और परिवार चला सकते हैं।*
*यह सब नियमित पठन द्वारा शास्त्र ज्ञान, नवीन चिकित्सा विधा में अपने को updated रखना और कठिन परिश्रम से ही संभव है जो पूरा जीवन पर्यन्त करना ही पड़ेगा।*
*रोगी AI के माध्यम से हमसे ज्यादा समझदार है, वो अपना diagnose और treatment सब जान कर आता है पर उसके पास चिकित्सा अनुभव, प्रायोगिक व्यवहारिक तार्किक क्षमता और युक्ति नहीं है, तभी एक वैद्य की value है।*
[8/17, 3:52 PM] Dr. D. C. Katoch sir:
Satya Kathan Vd Subhash Ji.
Rogi se jyada rogi ki reports ko theek karna aavshyak hai aajkal. Vastav mein reports ke results hi vikriti (dosh -dusya sammoorchhna) ke astitva ko parilakshit karte hain.
[8/17, 3:54 PM] Vd. V. B. Pandey Basti(U. P. ): 🙏
[8/17, 5:10 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*शुभम जी, यहां सत्त्व वृद्धि शब्द प्रयोग किया है यह सामान्य बोलचाल में हम कह तो देते है पर आयुर्वेद शास्त्र और सांख्य दर्शन के मूलभूत सिद्धांतों के अनुसार सत्त्व गुण का भौतिक रूप से न तो 'वर्धन' नया निर्माण होता है और न ही विनाश। आत्मा की भांति मन और सत्त्व गुण भी नित्य और नित्य शुद्ध स्वरूप हैं।*
*जिस प्रकार दर्पण पर धूल जम जाने से उसका प्रतिबिंब धुंधला हो जाता है और धूल हटाने पर दर्पण का मूल प्रकाश स्वतः प्रकट हो जाता है ठीक उसी प्रकार सत्त्व वर्धन या आवरण-भंग conceptual reality वास्तविक अर्थ में सत्त्व का आवरण हटाया जाता है जिसे removal of veil/covering over sattva कह सकते हैं।*
*आवरण का कारण मन के दो मुख्य दोष हैं रज और तम ‘मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च’ च सू 1/57।*
*आवरण भंग की प्रक्रिया इस प्रकार है कि जब ध्यान, प्राणायाम, आचार रसायन, सत्त्वावजय चिकित्सा और आहार-विहार के शोधन से मन के रज (चंचलता/तनाव) और तम (अज्ञान/आलस्य) दोष क्षीण होते हैं तब सत्त्व पर पड़ा आवरण हट जाता है।।*
*व्यवहार में 'वर्धन' का प्रयोग जब रज और तम का आवरण हटता है तो सत्त्व गुण का 'अभिव्यक्ति स्तर' expression level बढ़ जाता है। इसी व्यावहारिक और चिकित्सीय अभिव्यक्ति को ग्रंथकार सत्त्व वृद्धि या सत्त्व बल वर्धन कहते हैं।*
*clinical स्तर पर समझें तो चिकित्सकीय दृष्टिकोण से…*
*अविद्या/अज्ञान/तनाव = तम व रज का आवरण।*
*ध्यान/साधना/औषध = आवरण को हटाने का साधन removal of blockage।*
*सत्त्व = स्व-प्रकाशित मूल स्वरूप inherent pure consciousness ।*
*अतः जब हम बायोकेमिकल मार्कर्स जैसे कॉर्टिसोल का घटना, सेरोटोनिन व बीडीएनएफ का बढ़ना, ईईजी में अल्फा वेव्स का आकलन करते हैं तो हम वास्तव में यह माप रहे होते हैं कि न्यूरो एंडोक्राइन स्तर पर रज और तम का आवरण कितना हट चुका है और सत्त्व का कितना प्रकटीकरण हुआ है।*
[8/17, 5:16 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*सादर नमन सर, व्यावहारिक और सही प्रायोगिक कथन कहा आपने 👏🙏 क्योंकि bio chemical रिपोर्ट जैसे lft, lipid profile, hr-crp आदि वस्तुतः शरीर के भीतर छिपी सूक्ष्म सम्प्राप्ति और 'दोष दूष्य सम्मूर्च्छना का ही objective स्वरूप हैं।*
*जब तक देह में 'साम' भाव और स्रोतोरोध रहेगा, तब तक लैबोरेटरी पैरामीटर्स में विकृति दिखाई देगी। जैसे ही औषध व ध्यान के माध्यम से जाठराग्नि व धात्वाग्नि दीप्त होती है सम्प्राप्ति का विघटन होता है और रिपोर्ट प्रायः स्वतः सामान्य range में आने लगती है।*
*अतः रिपोर्ट का सामान्य होना केवल कागजी आंकड़े ठीक होना नहीं है बल्कि यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण evidence of dhatu-samya है कि शरीर में धातुओं और महाभूतों का प्राकृत संतुलन स्थापित हो चुका है।*
[8/17, 5:27 PM] Prof. Giriraj Sharma:
सादर प्रणाम आचार्य श्री !
विद्या बृंहनाम = physiological/nourishing संभवतः सिर्फ गुणत्व
वृद्धि Anatomical
संभवतः यह
हालांकि वात वृद्धि लक्षण शास्त्र में उल्लेखित है जो अमूर्त बात के लिए प्रयुक्त हुआ है ,,,, गुणत्व कर्मत्व संभवतः
अन्य दोष धातु में
द्रव्यत्व गुणत्व कर्मत्व
ग्रहण करना चाहिए
[8/17, 5:31 PM] Dr Mansukh R Mangukiya Gujarat:
🙏प्रणाम गुरुवर वैद्यराज सुभाष शर्मा जी
आजकल सब रिपोर्ट को ठीक करवाना चाहता है। अपना शरीर का जो भी होना हो होने दो। लेकिन आयुर्वेद चिकित्सक शरीर और रिपोर्ट दोनो ठीक करते है। आप जैसे गुरुजन के आशिष हो तब शरीर और रिपोर्ट दोनो का ठीक होना निश्चित है ।
[8/17, 5:39 PM] Dr. Pawan Madan:
Pranam Guru ji
Marvellous Explanation about the biochemical marker for Satva.
@Shubham PGKC
Satva Rajas and Tam
Vaata pitta and kapha are a group of characters identified by a group of entities... These entities may be mass or energy or mass energy complex.
So one entity alone like cortisol can't be the sole responsible factor.
❤️
[8/17, 5:41 PM] Vd.Harsh ambasana: 🙏
[8/17, 5:43 PM] Dr. D. C. Katoch sir:
It is also important here to consider the stage of Samprapti - whether Sanchaye- Prakop- Prasar of doshas or sthanasanshreya, Vyaktavastha Bhedavastha of dosh-dushya sammoorchhna. Chikitsa siddhant varies from stage to stage of samprapti (from consequential stages of pathogenesis to clinical manifestation and complication).
[8/17, 6:03 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*अत्यन्त सूक्ष्म ज्ञान आचार्य गिरिराज जी 👏🙏 चर्चा
सत्त्व पर थी तो वात और सत्त्व में होने वाले परिवर्तनों को केवल गुणत्व और कर्मत्व के स्तर पर ही समझा जा सकता है।*
[8/17, 6:10 PM] Dr. Pawan Madan:
@Shubham PGKC
Similarly Aam is an Umbrella term.
It has wide meanings.
It may include several tens of entities based on various locations, actions and reactions.
[8/17, 6:11 PM] Dr. Pawan Madan:
Atyadhik Abhaar Guru ji
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
[8/17, 6:14 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*बिल्कुल सही दृष्टिकोण है पवन भाई 👌👍 ऐसा ही है।*
[8/17, 6:17 PM] Prof. Giriraj Sharma:
आदरणीय,,,
संभवतः,,
सत्व आदि गुण के सिर्फ गुण उल्लेखित है
वात दोष के गुण कर्म दोनों का उल्लेख मिलता है
पित्त कफ दोष के द्रव्यत गुणत कर्मत तीनों का उल्लेख है ।
सत्व सिर्फ गुण है यथा आत्मा के सिर्फ गुण/ लक्षण है सिर्फ,,,
मन के गुण लक्षण और कर्म मिलते है
इंद्रियों में सिर्फ कर्म मिलते है ।
मन को उभयात्मक कहते है स्थूल स्वरूप में ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय दोनों के भाव होने के कारण,,,,
वस्तुत मन उभयात्मक इसलिए भी है क्योंकि इसमें आत्मा के समान लक्षण गुण मिलते है
इंद्रियों के समान कर्म और ज्ञानग्रहण भाव,,,,
यहां सत्व गुण का बृंहण इसलिए ही मैने लिखा,,,
क्योंकि चरक सूत्र स्थान 30 में विद्या बृंहनाम उल्लेख मिलता है ,,,
यहां गुण से क्वालिटी (गुण )से ग्रहण किया जाना चाहिए,,,
जैसा कि मुझे समझ आया ।
[8/17, 6:26 PM] Dr. Pawan Madan:
अत्यंत सटीक 👌🏽👌🏽
मूलतः
शारीरिक व मानसिक दोष
सर्वदा गुणता: ही प्रकाशित होते हैं
🙏🏻🙏🏻
[8/17, 6:26 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*सही तो कह रहे हैं आप यहां बृंहण गुण के रूप में ही है।*
[8/17, 6:26 PM] Dr. Pawan Madan:
अत्यंत सटीक 👌🏽👌🏽
मूलतः
शारीरिक व मानसिक दोष
सर्वदा गुणता: ही प्रकाशित होते हैं
🙏🏻🙏🏻
[8/17, 6:26 PM] Vaidyaraj Subhash Sharma, Delhi:
*सही तो कह रहे हैं आप यहां बृंहण गुण के रूप में ही है।*
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Presented by-
Vaidyaraja Subhash Sharma
MD (Kaya-chikitsa)
New Delhi, India
email- vaidyaraja@yahoo.co.in
Compiled & Uploaded by-
Vd. Rituraj Verma
B. A. M. S.
Shri Dadaji Ayurveda & Panchakarma Center,
Khandawa, M.P., India.
Mobile No.:-
+91 9669793990,
+91 9617617746
Edited by-
Dr. Surendra A. Soni
M.D., PhD (KC)
Professor & Head
P.G. Dept of Kayachikitsa
Govt. Akhandanand Ayurveda College
Ahmedabad, Gujarat, India.
Email: kayachikitsagau@gmail.com

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